Sunday, 18 February 2024

स्कूली छात्र-छात्राओं ने तैयार किया मानवाधिकार का खाका

 यदि मानव अपने जीवन को खुशी खुशी गुजारता है तो उसे किसी भी प्रकार का मानसिक तनाव नहीं होता है। लेकिन किसी मानव के जीवन में दुख न आए तो उसे कठिनाइयों से लड़ने का साहस नहीं होगा। कठिनाइयों को पार करके ही मनुष्य को संघर्ष का अनुभव मिलता है।

मानवाधिकार को लेकर चलाए जा रहे साहस फाउंडेशन के जागरुकता अभियान का अगला पड़ाव ककराली गांव स्थित सीपीएस पब्लिक स्कूल रहा। इस कार्यशाला में 38 छात्र-छात्राओं ने खुलकर हिस्सा लिया। इस स्कूल में हमारी ये दूसरी वर्कशॉप हैं, इसलिए जैसे ही हम स्कूल पहुंचे वैसे ही छात्र-छात्राओं ने हमें घेर लिया और तमाम तरह के सवाल पूछ लिए। ये दिन खास इसलिए भी रहा क्योंकि स्कूल में बोर्ड के छात्रों को प्रोत्साहित करने के लिए कार्यक्रम की तैयारी हो रही थी, वहीं वसंत पंचमी के उपल्क्ष्य में रंगोली और सरस्वती वंदन भी रखा गया।



कार्यशाला की शुरुआत परिचय और सहमतियों के साथ की गई। उल्टा पुलटा खेल को विद्यार्थियों ने बखूबी खेला और उनकी हंसी ने वर्कशॉप के आने वाली चर्चा के लिए मंच सजा दिया। सत्र के पहले हिस्से में किशोर-किशोरियों से जब पूछा गया कि मानव की खूबियां क्या होती है तो कुछ देर के लिए चुप्पी साध ली, लेकिन तुरंत ही वो जवाब मिलने लगे जो अक्सर अध्यापक समझाते हैं कि अच्छे गुण होने चाहिए, आदर करना चाहिए और अच्छे संस्कार होने चाहिए। लेकिन ये अच्छे गुण और अच्छे संस्कार क्या है – पूछने पर थोड़ी उथल पुथल मची जिसने हमारे एक आसान से सवाल के अनेकों जवाब दे डाले।




सही-गलत में पहचान कर पाए, जिसे खुद का मनोरंजन करना आता हो, जो जिंदगी को जीना जानता हो, समझदार, महत्वकांक्षी, नियम का पालन करने वाला, ज्ञानी, मेहनती, लक्ष्य की ओर लगातार प्रयास करने वाला।  




इन खूबियों के लिए मानव की जरुरतों पर प्रतिभागियों ने जवाब दिया, माता पिता का साथ मिले, टीचर हो, समय मिलना चाहिए, समय पर खाना, जीवन जीने का अधिकार, शिक्षा का अधिकार – लड़कियों को शिक्षा का अधिकार नहीं मिलता, स्कूल में अगर लड़की पढ़ती है तो फिर भी मिल जाता है लेकिन जब हम घर जाते हैं तो पढ़ाई करने का उतना मौका नहीं मिलता क्योंकि घर के काम-काज में हाथ बंटाना पड़ता है और आज भी हमारे समाज में ऐसे लोग हैं जिन्हें लड़कियों का पढ़ना अच्छा नहीं लगता।





इसके बाद प्रतिभागियों को समूहों में बांटा गया और एक एक परिस्थिति देकर उसपर चर्चा करने के लिए कहा।

एक मानव होने का मतलब है कि उसे अपने जीवन में संघर्ष के साथ जीना आना चाहिए क्योंकि जब भी कोई व्यक्ति अपने जीवन में आगे की ओर बढ़ता है तो ये समाज उसे आगे नहीं बढ़ने देता। इसके साथ ही उसके पास अधिकार भी होने चाहिए।

मानव को अपने परिवार के बीच खुशी मिलती है, माता पिता नहीं होने पर बहुत दुख होता है। दुख तब भी है जब उसके पास कोई सहारा नहीं हो, उसके दिल में गुरु का ज्ञान न हो। हमें बचपन में खुशी का अनुभव होता है लेकिन बड़े होकर हमें दुखों का सामना करना पड़ता है।

एक मानव में अच्छाई और बुराई दोनों होती है। हमें किसी के साथ गाली गलौच नहीं करनी चाहिए। बड़ों के साथ साथ छोटों के साथ भी आदर और सम्मान की भावना रखनी चाहिए। कभी भी किसी गरीब का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए।





हमें सभी की इज्जत करनी चाहिए, जाति-धर्म, अमीर हो या गरीब किसी में फर्क या भेदभाव नहीं करना चाहिए। हम सभी को समानता का अधिकार मिला है इसलिए सभी का सम्मान करना चाहिए।

एक मानव होने का यह मतलब है कि एक दूसरे की समस्या को समझे और उसकी मदद करें। खुशी से जीने का मतलब ये है कि उसके पास रहने के लिए आवास, खाने के लिए खाना, पहनने के लिए कपड़े और धन होना चाहिए। मुश्किल से जीवन गुजारने का मतलब ये है कि इंसान को जीवन जीने के लिए कठिन परिश्रम करना पड़ता है, उसे शिक्षा नहीं मिल पाती, नाहि वो अच्छे कपड़े पहन पाता है और उसके पास धन का अभाव होता है।

सभी मानव बराबर नहीं है, क्योंकि सभी की खूबियां अलग अलग होती है। लड़का और लड़की में समाज में भेदभाव किया जाता है। हमें उनकी इज्जत करनी चाहिए जो हमारी इज्जत करते हैं।





प्रतिभागियों ने कई अहम बिंदूओं को छुआ – जहां ये बात साफ हो गई कि समाज में लड़का लड़की के बीच गैरबराबरी को ये देख पा रहे हैं, कहीं न कहीं आर्थिक परिस्थिति और जाति के आधार पर हो रहे भेदभाव को भी देखते और समझ रहे हैं। इन्हीं को लेकर हमने चर्चा को अधिकारों की तरफ मोड़ा।

अधिकार शब्द सुनकर प्रतिभागियों के मन में जो बातें आती है वो है – लड़का और लड़की में फर्क नहीं होना चाहिए, समानता का अधिकार, जाति को लेकर दूसरों का अपमान नहीं करना चाहिए, शिक्षा का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, लड़कियों को घूमने का अधिकार, खेलने का अधिकार, खुलकर अपनी बात रखने का अधिकार और अपने जीवन को जीने का अधिकार।



इसके बाद छात्र-छात्राओं ने मिलकर मानवाधिकार की परिभाषा तया की। सत्र की समाप्ति एक 3 मिनट के वीडियो को दिखाकर की गई जहां मानवाधिकार और हमारे संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों पर रोशनी डाली गई।

Saturday, 17 February 2024

मानवाधिकार को परिभाषित करते ग्रामीण किशोर-किशोरियां

 मुझे नहीं लगता हमारे समाज में सभी मानव बराबर हैं क्योंकि लड़का और लड़की में बहुत फर्क किया जाता है। लोग जाति के आधार पर भी भेदभाव करते हैं, कुछ लोगों को महज पैसे होने की वजह से कई मौके मिलते हैं जिनसे गरीब वंचित रह जाते हैं।

फरवरी का महीना हमारे लिए काफी अहम है, क्योंकि भेदभाव और गैरबराबरी के खिलाफ़ जिस आंदोलन की शुरुआत हमने की है वो फर्क लोग या तो देखना नहीं चाहते और कई परिस्थितियों में देखकर भी नजरदांज कर देते हैं। ये जो मानसिकता है कि जब तक मेरे साथ कुछ गलत नहीं हो रहा तब तक मैं कुछ क्यों करुं – ऐसा वही सोचते हैं जिनके पास सत्ता है, विशेषाधिकार है और वो ऐसे तबके से हैं जहां लोगों के अधिकारों को छीनकर पहुंचा जाता है। इस मानसिकता को चुनौती देने के लिए सबसे सटीक रास्ता है युवाओं, किशोर-किशोरियों को जागरुक करना। इसी उद्देश्य को लेकर साहस फाउंडेशन ने अलीगढ़ के दादो स्थित स्कूल में मानवाधिकार को लेकर एक कार्यशाला का आयोजन किया जहां 70 किशोर-किशोरियों ने बढ़ चढकर हिस्सा लिया।



वर्कशॉप की शुरुआत एक संक्षिप्त परिचय, कुछ सहमतियों और उल्टा-पुलटा खेल के साथ हुई। प्रतिभागियों ने खेल को खूब मजे से खेला और उनका सारा ध्यान क्लास के अंदर आ गया। पहली एक्टिविटी में प्रतिभागियों से मानव की खुबियां पूछी गई, काफी झिझक, थोड़ी-थोड़ी हंसी के बाद जवाब ऐसे रहे – जो बड़ों का सम्मान करता हो, मेहनती, दिमाग का इस्तेमाल करने वाला, सही गलत में फर्क कर पाए, दूसरों से प्रेरणा लेने वाला, अपने से छोटों का मार्गदर्शन कर पाए, गलतियों को समझने और सुधारने वाला, मेहनती – कर्म करने वाला, जो दूसरों से भेदभाव न करें, देशभक्ति और अच्छे संस्कार करने वाला।  



भारत में मौजूद समय में देशभक्ति और धर्म के नाम पर लोगों को गुमराह किया जा रहा है ऐसे में हमने छात्रों से देशभक्ति और संस्कार के असल मायनों पर परिचर्चा की – मसलन की उनके हिसाब से देशभक्ति क्या है, अच्छे संस्कारों का क्या मतलब है, जब आपको कोई संस्कारों की दुहाई देता है तो क्या आप सही गलत में फर्क कर पा रहे हैं? क्या आप सवाल पूछ पा रहे हैं या फिर अंधभक्ति के रास्ते पर चल रहे हैं।

इसी चर्चा को आगे बढ़ाने के लिए छात्र-छात्राओं से पूछा कि इन खूबियों के लिए एक मानव को क्या क्या चाहिए?बड़े लोगों का साथ, शिक्षा, सम्मान, आर्थिक सहयोग, अन्न/खाने का अधिकार, अनुभव, खुल का जीने का अधिकार इत्यादि।



मनुष्यों के अधिकारों को समझने के सफर आगे बढ़ाते हुए हमने प्रतिभागियों को 6 लोगों के समूहों में बांटा। जैसे कि अक्सर कक्षाओं में देखने को मिलता है – पहली लाइन में केवल लड़कियां बैठी हुई थी, दूसरी और तीसरी लाइन में केवल लड़के थे। कक्षा में जेंडर का विभाजन साफ तौर पर दिख रहा था, एक तरह की असहजता भी महसूस हो रही थी – ऐसे में हमने सोचा कि क्यों न परिस्थिति को थोड़ा बदला जाए। इसी को लेकर हमने लड़के और लड़कियों को मिलकर समूह बनाया और उन्हें दिए गए सवाल पर चर्चा करने के लिए प्रोत्साहित किया।





जाहिर सी बात है कि ऐसे माहौल से वो अनजान हैं जहां छात्र-छात्राओं को एक गोले में बिठाकर चर्चा के लिए कहा जाए, या फिर लड़के और लड़कियां बैठकर एक दूसरे के साथ मिलकर सीख सकते हैं। छोटे समूह में चर्चा शुरु होने से पहले काफी हो-हल्ला हुआ, झिझक दिखी, शर्माने वाली हंसी और डेस्क में सिर छिपाने जैसी बातें हुई। जब दो-तीन किशोरों ने लड़कियों के साथ चर्चा करने से मना करा तो हमने कारण पूछा, डरते हुए उनमें से एक ने कहा कि अगर हम लड़कियों के साथ बात करेंगे तो बाकी लड़के मजाक उठाएंगे और बाद में परेशान करेंगे। कुछ समय तक मचे इस कोलाहल के बाद सभी समूह एक दूसरे से चर्चा करते हुए नजर आए।



दो सवालों पर हुई चर्चा के कुछ अहम बिंदू इस प्रकार हैं

एक मानव होने का मतलब है कि एक दूसरे के साथ भेदभाव नहीं करें, लड़का और लड़की के साथ एक समान व्यवहार होना चाहिए। मुश्किल से भरे जीवन वो होता है जब पढ़ने नहीं दिया जाता है, अच्छी बातों से ध्यान हटता है।

जातिगत भेदभाव नहीं करना चाहिए। हमारे पास मौका है कि हम पढ़ लिखकर अपने देश की सेवा करें।

खुशी से जीवन जीने के लिए आर्थिक स्थिति मजबूत होनी चाहिए, नौकरी होनी चाहिए और परिवार।

मानव होने का अर्थ है कि हमें सभी मनुष्यों की इज्जत करनी चाहिए चाहे वो अमीर हो या गरीब हो लेकिन हमें किसी मानव में भेदभाव नहीं करना चाहिए। मुझे लगता है कि सभी मनुष्य बराबर है कहीं न कहीं सबमें कुछ न कुछ फर्क होता है।

सभी मानव बराबर नहीं होते हैं। क्योंकि कुछ लोग अमीर होते हैं और कुछ गरीब। अमीर लोग गरीबों पर अत्याचार करते हैं, गरीबों पर दबाव डालते हैं। सभी मनुष्यों की इज्जत करनी चाहिए जो लोग गलत रास्ते पर चलते हैं उन्हें भी सही रास्ता दिखाना चाहिए। मानवों में एकता होना बेहद जरुरी है।





मानव की खूबियों, जरुरतों और प्रतिभागियों की चर्चा से निकले बिंदुओं को मिलाते हुए ये समझ बनाई गई की एक मानव को गरिमा, आत्मविश्वास और खुशहाली से भरी जिंदगी जीने के लिए कुछ अहम चीजों की जरुरतें होती है और ये हमारे अधिकारों से जुड़ी हुई हैं।  

सत्र में आगे बढ़ते हुए अधिकार शब्द पर माइड मैपिंग की गई जिसमें अधिकार शब्द के मायने निकल कर आए – दूसरों के अधिकार नहीं छीनना, खुलकर बोलने का अधिकार, अपने मुताबिक जिंदगी जीने का अधिकार, देखने और सुनने का अधिकार, शिक्षा का अधिकार और अपने जीवन के फैसले लेने का अधिकार।




इस वर्कशॉप में 8वीं और 9वीं के छात्र-छात्राएं हिस्सा ले रही थी, 7वीं की क्लास का फ्री पीरियड था, ऐसे में कुछ किशोरी हमारी क्लास में आकर बैठ गई थी, उन्हीं में से एक ने कहा कि अधिकार का मतलब है कि वो अपने जीवन से जुड़े फैसलें खुद ले पाएं, ऐसा अधिकार लड़कियों के पास होना चाहिए।

हम सभी ने आगे बढ़कर मानवाधिकार की परिभाषा तय की जहां प्रतिभागियों ने कहा कि उनके लिए मानवाधिकार का मतलब है कि उनके पास शिक्षा का, जीने का और समानता का अधिकार होना ही चाहिए।

मानवाधिकार के सत्र खुशीपुरा गांव की किशोरियों और बाकी स्कूलों की छात्राओं के साथ करने के बाद ये स्कूल पहला ऐसा रहा जहां छात्राओं के मुकाबले लड़के ज्यादा थे, एक असहजता थी लड़कियों और लड़कों के बीच में, इसके साथ साथ अध्यापकों के व्यवहार में भी शक और असहजता साफ दिख रही थी। ग्रामीण अंचल की बात करें तो किशोरियों के लिए उनके पिता और भाई पहले पुरुष होते हैं जिनके साथ वो घर में रहती है, दोनों से अनुमति का रिश्ता है। जहां पिता और भाई से कुछ बात नहीं होती पर वो उसके जीवन के सभी फैसले यहां तक कि वो घर से बाहर जाएगी या नहीं वो भी तय करते हैं। ऐसे में जब किशोरी स्कूल जाती है जहां हर टीचर पुरुष होते हैं तो वो और डर जाती है, यहां भी अनुमति का रिश्ता बन जाता है और संवाद नहीं होता। ऐसे में जेंडर की ये खाई बढ़ती ही नजर आती है।

बड़े बड़े पोडियम और कार्यशालाओं में जब जेंडर की बात होती है, जेंडर से जुड़े कार्यों की बात होती है तो कहा जाता है कि अध्यापक ज्यादातर महिलाएं होती है, क्योंकि स्कूल 2 बजे खत्म हो जाता है और महिलाएं इसके बाद घर का काम करेंगी। लेकिन उत्तर प्रदेश और झारखंड दोनों ही जगह काम करके कुछ और ही नजर आया है। यहां ज्यादातर अध्यापक पुरुष होते हैं और एक्का दुक्का टीचर ही महिला होती है – क्यों? वो इसलिए क्योंकि जहां लड़कियों को घर से निकलने नहीं दिया जाता है, पढ़ने नहीं दिया जाता, ज्यादा से ज्यादा 8वीं की पढ़ाई के बाद रोक दिया जाता है वहां अध्यापिका की पोस्ट तक वो कैसे पहुंच पाएंगी? ऐसे में जेंडर और सामाजिक वर्ग की साझेधारी दिखाई दी।


पहली बार इस स्कूल में आयोजित कार्यशाला में छात्र-छात्राओं का उत्साह तो दिखा ही साथ ही आने वाली कार्यशालाओं के लिए मंच भी तैयार हो गया।

Friday, 16 February 2024

मौलिक अधिकारों की परिभाषा गढ़ती साहसी गर्ल्स

अधिकारों और गैरबराबरी की जंग में कई बातें, मुद्दे और किस्से सामने आते हैं जो जहन पर काफी प्रभाव तो डालते ही है साथ ही सोचने पर और लगातार सवाल उठाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। भारत में और विश्व में मौजूदा परिस्थितयों ने जहां मानवाधिकार की परिभाषा और पैदाइश पर सवाल खड़े कर दिए हैं वहीं हमें अपने संविधान और मूल्यों को एक बार फिर आत्मसाध करने के लिए आह्वान किया है। सामाजिक अध्ययन की किताबों में संविधान और मौलिक अधिकार महज एक चैप्टर बनकर न रह जाए, बल्कि भारतवासी संवैधानिक मूल्यों की अहमियत और समानता लाने के आंदोलन में इसकी जरुरत को समझ पाएं और अपने जीवन में उतार पाएं। इसी सोच को लेकर साहस फाउंडेशन ने खुशीपुरा गांव में साहसी गर्ल्स के साथ मेरे मौलिक अधिकार पर कार्यशाला का आयोजन किया।


वर्कशॉप की शुरुआत हमने भेड़ और भेड़िया के खेल के साथ की जहां लड़कियों के साथ साथ हमारी टीम मेम्बर सरला जी ने भी खुलकर भाग लिया। आगे बढ़ते हुए किशोरियों को 6 समूहों में बांटा गया और एक-एक परिस्थिति दी गई – जहां उन्हें आपस में परिस्थिति को समझना था, सोचना था कि क्या यहां किसी के अधिकार छीने जा रहे हैं अगर हां तो कौन से।



पहले सवाल के जवाब में प्रतिभागियों ने कहा –

किसी भी वजह से अगर लड़की को पढ़ाई छोड़नी पड़ रही है और घर के काम काज करने के लिए विवश होना पड़ रहा है तो वहां उसकी पढ़ाई का अधिकार और समानता का अधिकार छीना जा रहा है।

अगर लड़की के साथ साथ घर के काम काज में लड़का भी सहयोग देता तो शायद लड़की को पढ़ाई छोड़ने की जरुरत ही नहीं पड़ती। अक्सर घरों में लड़कियां ही काम करती है जो सही नहीं है।

गांववालों को उसकी मदद करनी चाहिए, अगर होशियार होते हुए भी उसे पढ़ाई छोड़कर कामकाज करना पड़ रहा है तो ये सही नहीं है। आर्थिक स्थिति सही नहीं होने की वजह से उसे काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। गांववाले उसके साथ जाति को लेकर भेदभाव करते हैं यानि उसे समानता का अधिकार नहीं मिल रहा है। 



पिछले 3 सालों से लगातार हम खुशीपुरा गांव की किशोरियों के साथ काम कर रहे हैं – नतीजन धीरे धीरे वो अपने जीवन में और आसपास जेंडर गैरबराबरी को देख पा रही हैं, उसे समझ पा रही हैं – ये सफर काफी मुश्किलों भरा रहा है क्योंकि जेंडर हमारे जीवन में ऐसे रसबस गया है कि गैरबराबरी जीवन का हिस्सा लगने लगती है और सही गलत समझने का मौका दिए बिना ही परिस्थिति स्वीकृत हो जाती है। वहीं जाति और धर्म आधारित गैरबराबरी को समझना थोड़ा और जटिल है – ये गांव यादव बहुल गांव है और कुछ को छोड़कर किशोरियां कभी गांव से बाहर ही नहीं गई है। लेकिन मौलिक अधिकारों पर बातचीत ने उस गैरबराबरी को समझने की नींव डाल दी है।

प्रतिभागियों के जवाबों, स्कूली छात्रों द्वारा बनाया गया मौलिक अधिकारों पर वीडियो और चार्ट पेपर के जरिए हमने संविधान और उसमें दिए गए मुख्य 6 अधिकारों पर चर्चा की। इस चर्चा का मकसद महज अधिकारों के नाम और उनकी परिभाषा याद करना नहीं बल्कि निजी जीवन में ये अधिकार कैसे दिखते हैं पर समझ बनाना रहा। आखिर में ग्रामीण परिपेक्ष्य और मौलिक अधिकारों को लेकर एक 5 मिनट का वीडियो दिखाया गया। इस वीडियो को देखकर अधिकारों पर समझ और मजबूत हुई।




वर्कशॉप में अब समय तक एक बेहद मजेदार खेल का, किशोरियों को भी इस बात का अंदाजा नहीं था कि अब आगे क्या होने वाला है। बच्चे अक्सर सांप सीड़ी का खेल खेलते हैं वहीं महिला हिंसा पर काम करने वालों ने भी इस खेल के जरिए हिंसा पर समझ बनाने की कोशिश की है। तो हमने सोचा क्यों न इस खेल का इस्तेमाल अधिकारों पर समझ बनाने के लिए किया जाए। सीड़ी के निचले छोर पर वो बातें थी जहां अधिकार मिल रहे हैं वहीं सांप के मुंह पर वो परिस्थितियां लिखी थी जहां अधिकार छीने जा रहे हैं या फिर उनका उल्लघंन हो रहा है। इस खेल में बाकी सभी को ये तय करना था कि कौन सा मौलिक अधिकार मिल रहा है या छीन रहा है। सांप सीढी के खेल में जीतने का जज्बा तो था ही साथ में कौन अधिकारों को पहचान पा रहा है उसका जोश भी दिखा है।




थोड़ी देर और खेलने दो दीदी, क्योंकि हमने अभी तक सभी सीढियों और सांप पर लिखी परिस्थितियां नहीं पढ़ी है।

साहसी गर्ल्स में हमें सभा करने का, खेलने का और जानकारी हासिल करने का अधिकार मिलता है।



कार्यशाला के बाद सभी किशोरियों ने पहली बार गांव में क्रिकेट खेला, बाद में सेनेटरी पैड बांटा गया और आखिर में लड्डू खाते हुए ऐलान किया कि अगली बार उन्हें समोसे और बड्डे मिलने चाहिए।

Tuesday, 6 February 2024

साहसी गर्ल्स ने तय कि मानवाधिकार की परिभाषा

 बुरे लोग वो हैं जो हम लड़कियों को साहसी गर्ल्स कार्यक्रम में आने से रोकते हैं, तरह तरह की अफवाह फैलाते हैं। आप दीदी अच्छे हो क्योंकि आप हमें शिक्षा से जोड़ने और अपने बारे में अलग अलग बातें समझाने का काम करते हैं। – प्रतिभागी

पर ये लोग तुम्हें क्यों कार्यक्रम में आने से क्यों रोकते हैं?’ – प्रशिक्षक

                          

'इन लोगों को जलन होती है, कि लड़कियां काफी कुछ सीख रही हैं, हमें पढ़ने का मौका मिल रहा है। जानकारी मिलने से हम अपने अधिकार मांगने लगेंगे और वो समाज को अच्छा नहीं लगता है। लड़कियां लड़कों से आगे निकल जाएंगी - प्रतिभागी

देश के अलग अलग कोनों में किशोर-किशोरियों, युवाओं और विभिन्न कार्यस्थल में कार्यरत लोगों के साथ जेंडर और यौनिकता की समझ बनाने के साथ साथ साहस फाउंडेशन पिछले तीन सालों से खुशीपुरा गांव में किशोरियों और महिलाओं के साथ काम कर रहा है। इस नए साल की शुरुआत हमने नए तरीके से नए जोश से करने की ठानी है। वैश्विक और भारतीय परिपेक्ष्य में जिस प्रकार मानवाधिकारों और संवैधानिक मूल्यों की अवलेहना की जा रही है, उसे देखकर ये अब और जरुरी हो जाता है कि युवा पीढ़ी संविधान और उसके मूल्यों को गहराई से समझे और जीवन में उतारे।

इस सोच को केंद्रित करते हुए हमने साहसी गर्ल्स के साथ मेरे मानवाधिकार कार्यशाला का आयोजन किया जहां गांव की 31 किशोरियों ने बढचढ़ कर हिस्सा लिया। कार्यशाला की शुरुआत इंस्पेक्टर और लीडर खेल से की गई जहां प्रतिभागियों ने अपनी लीडरशीप, समझदारी और रणनैतिक सोच का प्रदर्शन करते हुए बहुत मजे किए। किशोरियों ने कार्यशाला को सुचारु रुप से चलाने के लिए जरुरी सहमतियों को खुद पर खुद दोहराया। वर्कशॉप में आगे बढ़ते हुए प्रतिभागियों से पूछा कि मानव में क्या क्या खूबियां होती है – जवाब में एक दूसरे का सम्मान करना, भलाई, छोटी-छोटी चीजों में खुश होने वाले, बुद्धिमान, मेहनती, साहसी, एक दूसरे का साथ देना, ईमानदार, ताकतवर, तेज, खुशमिजाज आदि प्रतिभागियों ने साझा किया।




इसी संवाद को जोड़ता हुआ दूसरा सवाल था कि मनुष्य को ये खूबियां बरकरार रखने, उनकी बढ़ोतरी करने और सुरक्षित रखने के लिए किन चीजों की जरुरत होती है? जवाब में सन्नाटा रहा, शायद इसलिए क्योंकि आज भी किशोरियों से, ग्रामीण अंचलों में पूछा ही नहीं जाता कि उन्हें क्या चाहिए? क्या उन्हें किसी चीज की जरुरत है? इस सवाल को और समझाया गया तो कुछ ने कहा कि जानकारी होनी चाहिए, शिक्षा मिलनी चाहिए, थोड़ा समय होना चाहिए और माता-पिता की मदद। मन में विचार तो ये आया कि कैसी जिदंगी है जहां लड़कियों को लगता है कि बुनियादी जरुरतें पूरी करने के लिए उन्हें माता-पिता की मदद की आवश्यकता है जबकि ये सब चीजें उन्हें यूं ही मिलनी चाहिए उसके लिए उन्हें किसी के सामने हाथ फैलाने या कृतज्ञता से देखने की क्यों जरुरत पड़ रही है। और क्या माता-पिता मदद करते है या बच्चों को उनके प्यार और साथ की आस होती है।

                                     

प्रतिभागियों की चर्चा में एक और अहम बात निकल कर आई जिसपर विस्तार से चर्चा हुई। एक प्रतिभागी का कहना था कि पेपर में अगर खुद के नम्बर ज्यादा आते है तो अच्छा लगता है अगर किसी दूसरे के आते हैं तो जलन होती है। ये पूछने पर कि नम्बर किसके ज्यादा आते हैं उसमें जवाब आए कि वो बुद्धिमान होगा, क्लास के समय ज्यादा ध्यान दिया होगा, पढ़ाई में तेज होगा इत्यादि। अमूमन किसके नम्बर ज्यादा आते हैं ; इस दूसरे सवाल के जवाब में चर्चा की शुरुआत हुई और एक प्रतिभागी ने कहा, लड़कियां स्कूल जाने से पहले घर का काम करती हैं, फिर स्कूल जाती है, वापस आकर भी घर में हाथ बंटाती है ऐसे में उनके पास पढ़ने और अभ्यास करने का काफी कम समय रहता है वहीं लड़कों को घर में कोई काम नहीं करना होता। ज्यादातर वो या तो बाहर घूमते हैं या पढ़ाई करते हैं जाहिए सी बात है उनके ही नम्बर ज्यादा आते हैं।  


आखिर में ये कहा गया कि अगर लड़का-लड़की दोनों घर के कामों में हाथ बंटाए, दोनों को अभ्यास का समय मिले तब देखा जाएगा कि किसके नम्बर परीक्षा में ज्यादा आएंगे। यहां एकेडेमिक उर्तीणता, जेंडर और मानवाधिकार का एक समावेश समझने को मिला।

इस गतिविधि के बाद सभी प्रतिभागियों को 6 समूह में बांटा गया और एक सवाल पर चर्चा करने को आमंत्रित किया गया। पहला सवाल – एक मानव होने का क्या मतलब है? खुलकर जिंदगी जीने और मुश्किल से जिंदगी काटने में क्या फर्क हैं।

पहला जवाब – एक मानव होना का मतलब ये है कि वो सही से खाना खाए, कपड़े पहनने को मिले, रहने के लिए घर हो। वो चीजों को समझ पाएं, सही –गलत का फर्क कर पाए और बुद्धिमान होना। इस समूह का ये भी कहना था कि मनुष्य को हर परिस्थिति में खुश रहना चाहिए चाहे फिर वो खुशी का मौका हो या दुख का। मुश्किल के समय में, जहां लोग उसे नापसंद करते हो, अपने लोग भी पराए हो जाए तो उसे खुश रहना चाहिए और हटकर मुश्किल का सामना करना चाहिए। यहां प्रशिक्षक ने पिछले साल हुए मानसिक स्वास्थ्य कार्यशाला की सीख को याद कराया और जोर दिया कि हमेशा मजबूत रहने की जरुरत नहीं होती, जैसा महसूस हो रहा है उसे होने देना चाहिए नहीं तो भावनाएं अंदर अंदर इंसान को परेशान कर देती है और इससे परिस्थिति खराब ही होती है।

दूसरे जवाब में जेंडर समानता की इच्छा जाहिर की गई कि खुलकर खुश जिंदगी का मतलब है कि लड़कियों को भी लड़कों के बराबर समझना चाहिए, उन्हें भी उतने मौके, प्यार और इज्जत मिलनी चाहिए जितना परिवार औऱ समाज लड़कों को देता है। इसके अलावा इस समूह का ये भी मानना था कि जो लोग गलत करते हैं और दूसरों को नुकसान पहुंचाते हैं उनकी इज्जत नहीं करनी चाहिए।



दूसरा सवाल – क्या आपको लगता है कि सभी मनुष्य बराबर है? क्या सभी मनुष्यों की इज्जत करनी चाहिए। पहले समूह का मानना रहा कि सभी मनुष्य बराबर नहीं होते क्योंकि कुछ लोग अच्छे होते हैं और कुछ बुरे। अच्छे इंसान एक दूसरे को समझते है, इज्जत करते हैं जबकि कुछ लोगा ऐसा नहीं करते। इनके हिसाब से सभी मनुष्यों चाहे वो अच्छे हो या बुरे सभी की इज्जत करनी चाहिए क्योंकि वो तो अच्छे हैं और बुरे लोग समय के हिसाब से सुधर जाएंगे और उन्हें अपनी गलती समझ आ जाएगी। इस कथन पर बहुत जरुरी चर्चा हुई क्योंकि यही आधार है जेंडर आधारित हिंसा और कई तरह की गैरबराबरी का – जो इंसान दूसरों पर अत्याचार कर रहा है, भेदभाव कर रहा है वो सोच समझकर अपनी सत्ता का इस्तेमाल करके दूसरों को नीचा दिखाना चाह रहा है। ऐसे लोग स्वंय नहीं बदलते। प्रशिक्षक ने दिसंबर में साहस के खिलाफ गांववालों के व्यवहार को उदाहरण लेते हुए समझाया कि एक दूसरे का आदर करना बहुत जरुरी है लेकिन जब वो एकतरफा हो तो सही नहीं है। हिंसा करने वालों के खिलाफ आवाज उठाना और दूसरों को जागरुक करना बहुत अहम है।

दूसरे समूह के मुताबिक सभी लोग बराबर नहीं है क्योंकि लड़कियों को लड़कों के बराबर इज्जत नहीं मिलती, बराबरी नहीं मिलती। प्रतिभागियों का कहना था कि इज्जत सभी की करनी चाहिए, चाहे वो बड़े हो या दोस्त हो। साथ ही बड़ों को छोटों का भी सम्मान करना चाहिए। इज्जत करना एकतरफा नहीं होना चाहिए। सम्मान उसका करना चाहिए जो बातों को समझे, परेशानी में साथ दे पर जो लोग परेशान करते हैं उनसे दूरी बना लेनी चाहिए।

इन सभी बातों को जोड़ते हुए समझ बनाई गई कि गोले के अंदर लिखी सभी बातें मानव की गरिमा और स्वाभिमान से जुड़ी हुई है और यही सारी बातें मनुष्य को पूरा करती है और गोले के बाहर जो भी लिखा है वो मानव गरिमा को बनाए रखने के लिए जरुरी है। इन्हीं जरुरतों पर मानवाधिकार आधारित हैं।

आगे बढ़ते हुए अधिकारों पर चर्चा की गई – जहां किशोरियों ने कहा कि लड़कियों को लड़कों के बराबर अधिकार मिलने चाहिए, खेलने का अधिकार, पढ़ाई करने का अधिकार, बाहर घूमने का अधिकार और फोन या तकनीकि यंत्र तक पहुंच का अधिकार होना चाहिए। प्रतिभागियों और प्रशिक्षक ने इसके बाद मानवाधिकार को अपने शब्दों में परिभाषित किया जहां जमीन और पैसे का अधिकार भी सामने आया क्योंकि किशोरियों को लगता है कि जिसके पास पैसा होता है उसी की इज्जत होती है और जमीन होने पर खेती की जा सकती है – यानि खाने का अधिकार। इसके अलावा सूचना का अधिकार भी सूची में शामिल किया गया। एक और अहम चर्चा में एक किशोरी ने कहा कि दिमाग होना चाहिए – तभी तो चीजें मिलेंगी लेकिन प्रशिक्षक के वापस सवाल किया कि दिमाग तो सभी के पास है पर चीजें तो सभी को नहीं मिलती । उन्होंने शिक्षा और सही जानकारी होने पर जोर देते हुए कहा कि शिक्षा से न केवल नौकरी मिलती है बल्कि इंसान अपने आप को, अपने आसपास को और दूसरे लोगों को बेहतर समझता है और समाज की उन्नति में सहयोग देता है।

सत्र का समापन मानवाधिकार पर एक छोटी फिल्म दिखाकर किया गया। कार्यशाला में किशोरियों का उत्साह और मुद्दे पर समझ देखकर काफी अच्छा लगा। ये दिन काफी चुनौतीपूर्ण रहा कि तड़के से ही मूसलाधार बारिश हो रही थी, आखिर समय में वेन्यू भी बदलना पड़ा, गांव के अंदर का रास्ता कच्चा तो है ही लेकिन बारिश के समय फिसलन बढ़ जाती है ऐसे में लग रहा था कि क्या किशोरियां आ पाएंगी। पर हमारे गांव पहुंचने से पहले ही कई प्रतिभागी प्रशिक्षण स्थल पर मौजूद थे और उन्होंने हमारा स्वागत हंसकर और मुस्कुराहटों से किया। हमारी साहसी गर्ल्स हर दिन हमारा उत्साह और काम पर विश्वास बढ़ाती रहती।