Monday, 15 July 2024

‘लापता लेडीज’ ने सुलझाएं साहसी गर्ल्स के सवाल और विवाद

 

लड़कियों के पास से फोन मिल रहे हैं, पता नहीं किस से बातचीत करती हैं।

मेरी मां ने कहा कि उसके साथ मत रहा करो, वो सही लड़की नहीं है।

अगर लड़कियां गलत करेंगी तो भाई और पिता से मार तो खाएंगी ही

गांव का माहौल अच्छा नहीं है इसलिए पापा ने छर्रा की कॉलेज में जाने से मना कर दिया है।

ऐसी अफवाहों और बातों का गांव में आज से नहीं सालो साल से चलन रहा है, लड़कियों को बुनियादी सुविधाओं और अधिकारों से दूर रखने के लिए उनके किरदार पर सवाल उठाना, घर के काम में झोंक देना, मारपीट करना और कम उम्र में शादी करवा देना। पिछले 4 सालों से हम इसी मानसिकता से लड़ने की कोशिश में जुटे हैं पर हमारी चुनौतियां दुगनी हो जाती है जब यही बातें हमारे कार्यक्रम में आने वाली किशोरियां कई अहम सत्रों के बाद बोलती है। पिछले दो महीनों से जितने बार भी बातचीत हुई यही बातें निकल कर – एक दूसरे से ईष्या, दूसरों के बारे में अफवाह फैलाना, इधर की बात उधर करना, एक समुदाय की भावना से बहुत परे होना – ऐसे में हमने अपना प्लान ऑफ एक्शन थोड़ा बदला और सोचा कि कार्यशाला की जगह एक फिल्म दिखाई जाए। मजे की बात ये है कि बोर्ड की परीक्षा में सफल हुई किशोरियों के लिए आयोजित समारोह के तुरंत बाद हमारी नजर फिल्म लापता लेडीज पर पड़ी। इस फिल्म में हमारे समुदाय में आने वाली हर चुनौती, समस्या और किशोरियों को पढ़ाई के लिए प्रेरित करने समेत कई मुद्दों के जवाब थे।




बस फिर क्या था हमने फिल्म स्क्रीनिंग की तैयारी शुरु कर दी। साहसी गर्ल्स कार्यक्रम में आने वाली एक किशोरी के घर में स्मार्ट टीवी थी, तो हमने तय किया कि कार्यक्रम वहीं आयोजित किया जाएगा। बिजली की समस्या काफी है तो हमने किसी तरह इन्वर्टर का इंतजाम भी कर लिया। बड़े उत्साह से हम गांव पहुंचे, जहां फिल्म दिखाई जाने वाली थी किशोरियां पहले ही वहां पहुंच चुकी थी। जो हम डिजाइन करते हैं और जो जमीनी हकीकत है वो काफी अलग होती है – फिल्ड की चुनौतियां इतनी है कि गांव में फिल्म दिखाना भी किसी पहाड़ पर चढ़ने से कम नहीं है। तकरीबन 1 घंटे तक लगातार प्रयास करने पर भी फिल्म बड़ी स्क्रीन पर नहीं चली – ऐसे में हमारे पास दो ही तरीके थे – एक की फिल्म ही न दिखाएं दूसरा कि कोई तरकीब ऐसी हो कि फिल्म भी दिखा पाएं औऱ चर्चा भी हो पाएं।




हमने फैसला लिया कि हमारे पास 3 स्मार्टफोन है – छोटे छोटे समूहों में किशोरियां ये फिल्म बैठकर देख ले। पहले तो थोड़ी मुश्किल हुई पर बाद भी सभी प्रतिभागी फिल्म दे पाएं। लम्बी फिल्म होने की वजह से और कार्यक्रम देरी से शुरु होने की वजह से काफी विलंब हो चुका था ऐसे में कई किशोरियों के घर से बोला गया जल्दी वापस आने के लिए। हालांकि फिल्म में रुचि के कारण सभी लोग डटे रहे।

फिल्म खत्म होते ही सभी गोले में वापस आए, सभी मुस्कुरा रहे थे और आपस में बात कर रहे थे। ये पूछने पर कि आपको फिल्म कैसी लगी और फिल्म से क्या क्या सीखा, किशोरियों ने बताया –

जया की बहादुरी की वजह से वो खुद भी बच पाई और फूल की भी मदद कर पाई

ये जया का दिमाग और उसके पढ़े लिखे होने की वजह से ही फूल अपने घर वापस हो पाई। अगर वो चित्र नहीं बनवाती, फोन नम्बर नहीं लिखती तो फूल का कैसे पता चलता

पढ़ना बहुत ज्यादा जरुरी है

घूंघट की प्रथा की वजह से फूल गुम हो जाती है, उसे अपनी पति का नाम और गांव का नाम पता होता तो वो आराम से घर आ सकती थी। दीदी ये तो यहां भी होता है

जब फूल वापस आती है तो वो जोर से अपने पति का नाम लेकर बुलाती है। अगर तब भी वो पुरानी बातों में विश्वास करती तो फिर एक बार अपने पति से नहीं मिल पाती

दोनों लड़कियों की कहानी अच्छी थी, आखिर में दोनों के सपने पूरे हुए

फूल जब वापस आई तो मुझे लगता है कि वो जरुर कुछ काम करेगी

पुलिस ने मदद की, उसके पति से बचाया और पढ़ने के लिए भी कहा   

सभी किशोरियों को जया का किरदार बेहद पसंद आया। उसकी पढ़ाई, लगन और सही मौके पर सही फैसले लेने की वजह से उसने खुद को और फूल को बचा लिया। मजे की बात ये है कि फिल्म के आखिर में घर में मौजूद एक महिला ने कहा कि अब तो दोनों लड़कियां अपने अपने पति के घर में जाएंगी तभी एक 12 साल की लड़की ने बोला, नहीं जया आगे की पढ़ाई पूरी करने के लिए देहरादून जाएगी। अपने पति के पास नहीं।




जिस भावना की तलाश हम कर रहे हैं वो इन साहसी गर्ल्स में है बस उसे निखारने की जरुरत है। डिजिटल इंडिया में हमने एक फिल्म दिखाने के लिए जी तोड़ मेहनत की, पता नहीं सरकारी आकंड़े कहां लिए जाते हैं जो ये कहते हैं कि गांव में पढ़ाई भी डिजिटल माध्यम से हो रही है। खैर हम और साहसी किशोरियां हर रोज किसी न किसी बंधन और बेड़ियों को तोड़ते हुए आगे की नींव रख रहे हैं ताकि अपने सपनों तक पहुंच पाएं।

दीदी, फिल्म में ये भी अच्छा दिखाया कि कैसे अगर हम आगे पढ़ते हैं, तो हम न सिर्फ खुद की मदद कर सकते हैं बल्कि दूसरों का रास्ता भी आसान कर सकते हैं। आखिर में जब सब जया को छोड़ने के लिए जा रहे थे तो मुझे बहुत अच्छा लगा।  

बोर्ड परीक्षा में साहसी गर्ल्स का परचम

 

हमारे देश का बहुत बड़ा हिस्सा ग्रामीण अंचलों में बसता है लेकिन आज भी विकास के बड़े बड़े वादों और दावों के बीच यहां बसने वाले लोग बुनियादी सुविधाओं से महरुम हैं। गांव में सरकारी स्कूल होते हुए भी अध्यापकों की कमी, गांववालों का अविश्वास, भ्रांतियों की भरमार और आखिर में महज 5वीं तक क्लास के चलते गांव के बच्चे बुनियादी संपूर्ण शिक्षा पूरी नहीं कर पाते। मुश्किलें तब और बढ़ जाती है जब आसपास प्राइवेट स्कूल खोल दिए जाते हैं, अध्यापकों के नाम पर बेहद कम सैलरी में युवाओं को पद में रखा जाता है जिन्होंने खुद डिसटेन्स से ग्रेजुएशन बड़ी मुश्किल से पूरी की होती है – ऐसे में शहर की देखादेखी ग्रामीण अपने बच्चों को सरकारी स्कूल न भेजते हुए प्राइवेट स्कूल भेजते हैं। और शिक्षा का ये चक्र यूं ही चलता रहता है। ये एक और वजह से जिससे लड़कियां आगे नहीं पढ़ पा रही। पिछले 1 साल से साहसी गर्ल्स भी इसी समस्या से जूझ रही है – कुछ लड़कियां ऐसी है जिन्हें 10वीं के बाद सीधे 12वीं के फॉर्म भरे, गांव के प्राइवेट स्कूल में एडमिशन तो ले लिया लेकिन 9वीं से 12वीं तक की कोई क्लास ही नहीं लग रही।



ऐसे में साहस की टीम ने STEM विषयों के लिए खासकर अध्यापकों को तलाशना शुरु किया। बीच में 1-2 लोग तैयार तो हुए पर वो ज्यादा दिनों तक पढ़ा नहीं पाएं। काफी कोशिशों के बाद हमारी मुलाकात ग्रामीण युवा अनमोल से हुई तो सरकारी परिक्षाओं की तैयारी कर रहा है और साथ साथ बच्चों को पढ़ाने का काम भी करता है। छोटे से इंटरव्यू के बाद दिसंबर की शुरुआत अफ्टर स्कूल प्रोग्राम से हुई जहां 12 किशोरियों ने एडमिशन लिया। अनमोल और इन 12 किशोरियों की लगातार मेहनत का असर फाइनल परिक्षाओं में दिखा जहां 12वीं में एक किशोरी और 10वीं की 4 छात्राओं ने बेहतरीन नम्बर लाएं। साहसी गर्ल्स की इसी सफलता को मनाने के लिए हमने एक दिवसीय कार्यक्रम आयोजित करने का प्लान बनाया। इस खुशी को और बढ़ाने के लिए हमारे काफी समय से समर्थक रहे डोनर और मेरे पूर्व सहपाठी ने 5 डिजीटल घड़ियां किशोरियों को उपहर स्वरुप देने के लिए दिल्ली भिजवाई।

कार्यक्रम के दिन हम गांव में पहुंचने ही वाले थे तब पता चला कि एक किशोरी के घर में विवाद हो गया है – खुशी के माहौल में किशोरी दुखी होगी इस वजह से हमारे टीम के दो सदस्य वहां पहुंचे। विवाद मामूली था, तो जल्दी ही सुलझ गया इसके बाद टीम किशोरियों को मोबाइलाज़ करने में जुट गई। जब किशोरियां वेन्यू की तरफ बढ़ रही थी तब चलते चलते तीन लड़कियां एक दूसरे के साथ लड़ने लगी – कुछ ही समय में विवाद ने उग्र रुप ले लिया। टीम ने किसी तरह समाजाइश करते हुए उन्हें वेन्यू तक पहुंचने के लिए कहा। रिपोर्ट के पन्नों पर, नम्बरों की चमक धमक में अक्सर चाहे सरकार हो या गैर सरकारी संस्थाएं वो ये चुनौतियां जो फिल्ड पर रोजमर्रा होती है उसे नजरदांज कर देती है लेकिन एक समुदाय के लिए ये बातें भूलने वाली नहीं है।

हम जिस अवसर को उत्सव के तौर पर मनाना चाहते थे उसे कुछ देर के लिए अलग कर इस विवाद पर चर्चा की। ये पूछने पर कि क्या हुआ, किस बात पर लड़ाई की शुरुआत हुई तो एकदम चुप्पी छा गई। कोई भी प्रतिभागी बोलने को तैयार नहीं था – ऐसे में एक लड़की ने जो विवाद का हिस्सा थी उसने कहा कि मेरा मां ने दूसरी लड़की से दूरी बनाए रखने को कहा है। इतना बोलते ही वो दूसरी लड़की और गुस्से से बोली मेरा परिवार भी यही कहता है कि तुम से दूर रहो, अगर तुम्हारे परिवार की इज्जत है तो हमारे परिवार की भी है। ये बातचीत कुछ पिछले महीने हुए कार्यक्रम के बाद की बातचीत की तरह लग रही थी।

ये एक भयनाक सच्चाई है हमारे समाज की जहां किशोर और किशोरियां समाज में फैली कुरीतियों और पितृसत्ता का प्रतिबिंब बनते जा रहे हैं। हमारी कोशिश है इस विषम चक्र को तोड़ना ताकि मौजूदा पीढ़ि खुद का विकास कर पाएं और आगे के लिए एक मजबूत धरातल तैयार करें। खैर हमारी बातचीत आगे बढ़ती इसी बीच STEM विषय़ पढ़ाने वाले अध्यापक कार्यक्रम में हिस्सा लेने पहुंच गए और इस बातचीत पर विराम लगा दिया गया।

समारोह के शुरुआत में तीनों सफल छात्राओं ने बताया कि परिणाम पहली बार जब उन्हें पता चला तो कैसा लगा। 12वीं की परीक्षा पास करने वाली छात्रा के आंखों में आंसू थे, उसने बताया कि रिजल्ट ठीक रहा पर उसे ज्यादा नम्बर की उम्मीद थी। मैं ये सुनकर बहुत खुश थी क्योंकि ये वहीं छात्रा है जो ठीक एक साल पहले ये कहती थी कि आप कुछ करो नहीं तो मैं पास नहीं हो पाउंगी। अपने आप पर विश्वास होना, ज्यादा उम्मीद रखना ये जतता है कि वो खुद को समझ रही है, सपने देख रही है और आगे की रुपरेखा बुन रही है। बाकी दोनों छात्राएं भी काफी भावुक थी।




इसके बाद तीनों छात्राओं को माला, घड़ी और डायरी देकर सम्मानित किया गया। अनमोल के योगदान के लिए उन्हें भी सम्मानित किया गया। सभी प्रतिभागियों ने जोरदार तालियां बजाई, सभी में घड़ी देखने और उसे एक बार पहनने की इच्छा दिखी। इसके बाद हम सभी ने जलपान किया। अनमोल के जाने के बाद कार्यक्रम की शुरुआत में चल रही बातचीत को फिर से शुरु किया। एक किशोरी ने कहा कि घर में कोई आदमी काम कर रहा था तो हमने बस उससे बात कर ली, खाने पीने के लिए पूछ लिया तो क्या गलत किया। इसको लेकर हमारे किरदार पर बात कैसे आ गई। यही कारण है पूरे विवाद का।







हमने कुछ समय लिया कि कैसे ये समाज लड़की की यौनिकता को बेड़ियों में जकड़ कर रखना चाहता है – लड़कों से बातचीत करना, दोस्ती करना या फिर संबंध बनाने से कैसे परिवार की इज्जत जोड़ी जाती है पर वो इज्जत तब कहां जाती है जब घर में मारपीट होती है, लड़कियों की पढ़ाई छुड़वा दी जाती, कम उम्र में शादी करवा दी जाती है। और अगर लड़की कुछ कर रही है तो वहां लड़के भी तो है पर उन्हें कुछ क्यों नहीं कहा जाता – जब इतनी गैरबरबारी हमारा खुद का परिवार कर रहा है तो हम एक दूसरे से क्यों लड़ रहे है?  






इस बातचीत के तुरंत बाद हमने सोच लिया कि इस मुद्दे पर और चर्चा होनी चाहिए क्योंकि यहां समुदाय और एक दूसरे को सहयोग करने की भावना कम दिख रही है। खैर कार्यक्रम की समाप्ति हुई और हम गांव की ओर चल दिए। क्योंकि हमें दो विकलांग किशोर और किशोरी के घर जाना था इसलिए वहां हम एक किशोरी के साथ पैदल चल पड़े। सभी लड़कियां अलग उत्साह में थी तो सभी हमारे साथ चलने लगी। पूरा जमघट गांव की तरफ एक दूसरे से बात करते हुए हंसते मुस्कुराते हुए चल रहा था। गर्मी का मौसम था और सामने आइसक्रिम बेचने वाले दिखे – ऐसे में तकरीबन 50 लड़कियों के लिए उनकी मनपंसद आइसक्रिम खरीद ली। खुशी में अगर कुछ ठंडा और मीठा मिल जाए तो बात ही बन जाती है।



इसके बाद हम किशोरी के घर पहुंचे जिसे पांव की विकलंगता है। वो यहां अपनी नानी, मामा और मामी के साथ रह रही है। संवाद के दौरान पता चला कि उसकी मां की मृत्यु के बाद उसके पिता जी ने मामा के पास छोड़ दिया है। उसका परिवार और टीम के बीच बातचीत में वो किशोरी चुपचाप उसके बारे में होती हुई चर्चा को सुनती रही। मोना ने इस संवाद को रोकते हुए किशोरी से पूछा कि यहां सभी लोग उसके भविष्य, विकलांगता सर्टिफिकेट और तमाम चीजों के बारे में बात कर रहे है ऐसे में उसकी राय क्या होनी चाहिए। बहुत चुपके से उसने सिर हिलाया। फिर इस चर्चा पर विराम लगाते हुए उसे चित्र बनाने और कॉपी में रंग भरने के लिए आमंत्रित किया। बहुत ही बारीकि और खूबसूरती से उसने ड्राउंइग में रंग भरा, ऐसा करते हुए उसके चेहरे पर एक हल्की मुस्कुराहट भी थी। चित्र जब बन गया तो उसने मोना से कहा कि चार साल बाद उसने किताब को हाथ में लिया है। उसे ये सब की जानकारी तो नहीं है वो बस आगे पढ़ना लिखना चाहती है। हमने प्रण किया कि यहां काम होने की आवश्यकता है – हम ऐसा स्कूल जरुर ढूंढेंगे या फिर व्यवस्था करेंगे ताकि वो आगे पढ़ पाएं।




रमेश के घर हम पहुंचे तो वो हमारा ही इंतजार कर रहा था, क्योंकि उसे पता लग गया था कि आज लड़कियों के साथ कार्यक्रम है तो हम सब भी उससे मिलने आएंगे। इस बार साहसी गर्ल्स और रमेश ने सांप सीड़ी का खेल खेला, काफी देर तक चले इस खेल में रमेश को जीत मिली। इस जीत की खुशी देखते ही बनी। हमने उसे ये खेल तोहफे में दिया और बाकी लड़कियों को उसके साथ कभी कभार खेलने के लिए भी बोला।

आखिर पड़ाव में हम एक ऐसे घर पहुंचे जहां तीनों लड़कियां साहसी गर्ल्स कार्यक्रम का हिस्सा भी है और दूसरी लड़कियों को जानकारी देने का काम भी करती है। बात करने पर पता चला कि कैसे उनके पिता तीनों के साथ दुर्व्यवहार करते हैं, दिल्ली में काम करते हैं लेकिन जब भी घर आते हैं तो लड़ाई का माहौल रखते हैं, गालियां देते हैं मारपीट करते हैं। लड़कियों से सीधे मुंह बात भी नहीं करते। पढ़ाई से जुड़ा खर्चा तो दूर रोजमर्रा के लिए भी अपने परिवार में पैसा नहीं देते। ये बड़े दुख की बात है कि जो पिता आपको इस दुनिया में लाया वो आपको प्यार नहीं करता, स्पोर्ट नहीं करता बल्कि आपके साथ हिंसा करता है। किशोरियों की एक एक बात से मेरा मन टूट रहा था। बतौर साहस खुशीपुरा गांव में हमारे काम का ये एक जरुरी हिस्सा बन गया है कि हम इन सभी लड़कियों के लिए एक ऐसा सुरक्षित माहौल बना पाएं कि ये इस हिंसा को चुनौती देकर अपने सपनों की ओर बढ़ पाएं।

हालांकि इन्हीं में से एक किशोरी आज सुबह बड़े झगड़े का हिस्सा थी। ये जो परिवार के प्रति इनका गुस्सा है, जो दिल में जकड़ा हुआ जिसे ये निकाल नहीं पा रहे वो ये दूसरी लड़कियों पर निकाल रहे हैं। ये सही नहीं है जहां सुरक्षा का घेरा बन सकता है उसे ये व्यवहार और गुस्सा तोड़ रहा है। हमने समझाने की कोशिश की जहां का गुस्सा है ये वहीं जाना चाहिए। आपको सही नहीं लगता आप परिवार में बोलो, अगर नहीं बोल पा रहे हो तो मदद मांगों, अपने गुस्से और भावनाओं को समझने की प्रोसेस करने की कोशिश करो नाकि दूसरों पर भड़ास निकालो। एक बार फिर हमने उन्हें भरोसा दिलाया कि हम उनके लिए स्पोर्ट सिस्टम है जहां वो अपनी मन की बात कह सकते हैं, जो भी मदद या सहयोग चाहिए मांग सकते है।

एक ही दिन में हमने अलग अलग भावनाओं को जीया, कई परिवारों से, किशोरियों से, विकलांग जन और उनके परिवार से विस्तार से बातचीत की। साहस गांव को समावेशी और विकसित करने में एड़ी चोटी का जोर लगा रहा है, हमारी उम्मीद है कि गांव की लड़कियां इस विचार को और आगे ले जाएंगी।

समुदाय में व्यापत अदृश्यता को चुनौती देने की पहल


खुशीपुरा गांव में किशोरियों और महिलाओं के साथ कार्यक्रम करते हुए हमें 4 साल हो गए हैं। लेकिन जो सबसे बड़ी रुकावट लड़कियों की आजादी और उनके अधिकारों को पाने में हैं वो उनका खुद का परिवार है। सदियों से चलती आ रही पितृसत्ता को मजबूती परिवार का ढांचा दे रहा है ऐसे में हमने साहसी गर्ल्स कार्यक्रम की किशोरियों के घरों में जाकर उनके माता पिता से मिलने का अभियान शुरु किया। जहां कई बार परिवार से हमें दो टूक जवाब मिला वहीं कई परिवारों ने आगे बढ़कर हमारे साथ चलने का फैसला भी लिया – हालांकि उन्होंने भी कभी कभार समाज के चार लोगों का डर भी साझा किया। लड़कियों के साथ साथ घर में विकलांग जन जो लड़का हो या लड़की दोनों को ही पर्दे के पीछे छिपाकर रखा देखा गया।

अगर गांव को विकसित करना है उसे आगे बढ़ाना है तो सभी को आगे बढ़ना होगा – खासकर उन सभी पहचानों को जिन्हें समाज लोगों की आंखों से दूर रखना चाहता है। 17 वर्षीय युवा जिसे CP है उसके घर में हमारी ये हमारी तीसरी विस्ट रही। घर में घुसते ही रमेश (नाम बदला हुआ) की हल्की मुस्कुराहट ने हमारा स्वागत किया। उसने बड़े उत्साह से बताया कि ड्राउइंग कॉपी में उसने रंग भरे, हमें याद भी किया और उसकी माता जी ने भी अपनी किताब में रंग भरा। साहसी गर्ल्स के साथ कहानी सुनने और तैयार करने की कार्यशाला की तो यहां भी हमने सोचा क्यों न यहां भी कहानी सुनाई जाए। रमेश के लिए हम दो कहानियों की किताबें लेकर आए – उसकी इच्छा के अनुसार हमारे एक साथी ने कहानी पढ़ कर सुनाई। धीरे धीरे घर के बाकी सदस्य, हमारी प्रोग्राम में हिस्सा लेने वाली प्रतिभागी भी आ गई। और इस तरह हम सभी ने कहानी का आनंद भी उठाया और उससे सीख भी ली।



रमेश के घर से दो किशोरियां हमारे कार्यक्रम में आती है, उन्हें हमने जिम्मेदारी सौंपी की वो हर दूसरे दिन उसे एक कहानी पढ़कर सुनाए और साथ ही पढ़ने में उसे सहयोग भी करें। बाद में ब्लॉक के जरिए हिन्दी की वर्णमाला और नम्बर याद करने की शुरुआत की। इन छोटी छोटी गतिविधियों को करने का एकमात्र उद्देश्य ये ही कि रमेश अपने उम्र के युवाओं की तरह पढ़ाई से जुड़े, उसकी रुचि पढ़ने में लगे और साथ ही गांव समाज की जो मानसिकता है लगातार विकलंगता पर पर्दा डालकर उन्हें या तो अदृश्य करने की या फिर समाज से दूर रखने की उसे चुनौती दे पाएं। ये पहले वो कदम है जो रमेश अपने खुद के लिए उठा रहा है और हम इस सफर में उसके हमकदम है।



इसके बाद हम सभी ने गांव से जुड़ी कुछ बातें की, रमेश ने आगे पढ़ने की इच्छा जताई जिसपर हम काम करने की कोशिश करेंगे और फिर थोड़ा चलपान करते हुए हम आगे बढ़े।




गांव में लगातार अलग अलग किशोरियों को लेकर अफवाहें फैलाई जा रही है कि किसी के पास फोन मिला है, तो कोई लड़की किसी लड़के के साथ बातचीत करते हुए देखी गई है इत्यादि। समाज की कुरीतियों और किशोरावस्था के मुद्दों पर बनी चुप्पी का आघात किशोरियों पर ही पड़ रहा है। इसी सिलसिले में हमने एक किशोरी से बात की जिसपर आरोप लगाया जा रहा है कि उसके पास फोन मिले है, और वो लड़कों से बात करती है और छोटी छोटी बातों का बहाना बनाकर घर से निकल जाती है। पर असल बात तो ये है कि वो घर की सबसे बड़ी बेटी है, बहुत कम उम्र में मां की तबियत खराब होने की वजह से उसकी पढ़ाई छुड़ा दी गई बाद में घर में बढ़ते काम, पारिवारिक विवाद और उम्र का बहाना बनाते हुए उसे स्कूल जाने नहीं दिया। घर और खेत की पूरी जिम्मेदारी बचपन में उसके उपर डाल दी गई, पिता दिल्ली में काम करता है और पूरे परिवार से उनका कोई वास्ता नहीं, बड़े भाई ने शादी कर ली तब से घर में बस कलेश ही कलेश बना हुआ है – उसकी जिम्मेदारी कम होने की जगह बढ़ती ही गई ऐसे में अगर वो घर से बाहर कुछ समय निकल जाए और किसी से दो बातें कर ले क्या इसमें कुछ बुरा है? शायद नहीं लेकिन समाज यहां भी उसपर इज्जत का बोझ डाल देता है।

हमने उससे विस्तार में बात की, समझाया और पूछा भी कि वो क्या समझती है और इस परिस्थिति में उसे क्या सहयोग चाहिए। एक और किशोरी से बातचीत पर पता चला कि हमारे कार्यक्रम में आने वाली बहुत ही होनहार लड़की के साथ उसके पिता और भाई मारपीट करते हैं क्योंकि सभी को लगता है कि उसका किसी के साथ चक्कर चल रहा है। बहुत ही दुख की बात ये है कि गांव की पितृसत्तामक सोच से लड़कियां भी बच नहीं पा रही क्योंकि इस किशोरी के मुंह से सीधे ये निकला कि लड़कियां बिगड़ रही है, उनके पास फोन मिल रहे हैं और वो परिवार की इज्जत खराब कर रही है – ये पूछने पर कि क्या उसने ऐसा देखा या किसी और ने देखा तो झट से जवाब आया नहीं सभी कहते हैं, उसने भी कहा। अगर कोई लड़की दूसरी लड़की को ये बताती है कि उसके साथ मारपीट हो रही है तो सहानुभूति की जगह उसके किरदार पर कैसे सवाल उठ रहा है। जेंडर की दलदल इतनी मजबूत है कि हम कुछ भी करेंगे पर लड़कियों को घरों में सजा धजा कर कैद करके रखेंगे ताकि वो पहले माता पिता में मुफ्त में सेवाएं दे और फिर बाद में ससुराल में सबका बोझ उठाएं। इस तानेबाने को इतना अच्छे से बुना गया है कि महिलाएं और लड़कियां इसे खुद बुनना चाहती है, गलती से कोई बाहर निकलना चाहे तो खुद पहरेदार बनकर उसी लड़की को कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। ये हमारे लिए एक बड़ी चुनौती है जहां हमें नारीवादी सोच और दोस्ती को बढ़ावा देना होगा ताकि इस पितृसत्तामक रुपी जाल को भेद पाएं और आजादी की ओर कदम बढ़ा पाएं।    

अपने नेतृत्व और आत्मविश्वास की कहानियां गढ़ती साहसी गर्ल्स

मुझे पहले लगता था कि लड़के लड़कियों से ज्यादा ताकतवर होते हैं शायद इसलिए वो कुछ भी कर सकते हैं, और आगे बढ़ने का मौका भी उन्हें मिलता है। पर पिछले एक साल में हमने कई कार्यशालाओं में भाग लिया, मोना दीदी और पूर्वी दीदी ने समझाया कि हम लड़कियां भी कुछ भी कर सकते है। इससे मुझे अपने उपर एक विश्वास जगा और समझ में आया कि अगर हम भी हिम्मत करें, आगे बढ़े तो हम लड़कों से भी आगे निकल सकते हैं और अपने सपने पूरे कर सकते हैं।

बतौर साहस हम पिछले 4 साल से खुशीपुरा गांव की किशोरियों के साथ कई अहम मुद्दों पर समझ बनाने के साथ साथ वो खुद की आवाज को पहचान पाएं और अपने हकों के लिए उसे बुलंद कर पाएं की कोशिश में जुटे हुए हैं। लड़कियां कार्यक्रम से मिली सीख को, अपनी समझ को और खुद की कहानी को कह पाएं इसी सोच से मार्च के महीने में हमने मैं साहसी मेरी कहानी कार्यशाला का आयोजन किया जहां 40 लड़कियों ने हिस्सा लिया। हमारे कार्यक्रम में बड़ी लड़कियों के साथ साथ हमेशा 8-11 साल की कई बच्चियां भी आती है – उन्हें कार्यशाला में शामिल करना संभव नहीं हो पाता। हालांकि उनके उत्साह से प्रेरित होकर हमने तय किया कि क्यों न उनके लिए कुछ रचनात्मक किया जाए – इसलिए उन्हें रंगों और पेपर के साथ बिठाया ताकि वो अपनी कल्पना को अपने मन मुताबिक आकार दे पाएं।




कार्यक्रम की शुरुआत होते ही 5-6 लड़कियों का पहला समूह पहुंचा जिनमें से एक छात्रा हमारी STEM पाठ्यक्रम का हिस्सा है और इस वर्ष 12वीं का बोर्ड भी दिया है। उसने बड़े ही हर्षोल्लास से बताया कि ट्यूशन से उसे काफी मदद मिली और पेपर बहुत अच्छा गया – विशेष तौर पर गणित और भौतिक विज्ञान। कार्यशाला से पहले ये सुनना काफी प्रेरक रहा है। इसके बाद धीरे धीरे बाकी प्रतिभागी भी पहुंच गए।



एक किशोरी जिसने 10वीं बोर्ड के पेपर दिए है और कम बोलती है उसने बड़े उत्साह से बोला, ‘दीदी आपने एक चीज तो बहुत अच्छी की है। स्कूल के बाद जो क्लास होती है जहां हम गणित, विज्ञान की पढ़ाई करते हैं वो बेहतरीन है, हमारे अध्यापक बहुत अच्छे से पढ़ाते हैं, अगर कुछ समझ न आए तो हमारी हिम्मत बढाते हैं, बिना डांटे हुए बार बार समझाते हैं। फिर भी नहीं आए तो कहते हैं कि कोई बात नहीं आज नहीं आया तो कल समझ में आ जाएगा। पहले हम स्कूल जाते थे पेपर देते हैं पर पढ़ाई बिलकुल समझ नहीं आती थी। अब विषय समझ में आता है, हमारी रुचि बढ़ी है और पढ़ाई में भी मन लगता है।   



सभी प्रतिभागियों के आने पर हमने कार्यशाला की शुरुआत एक खेल से की। इसके बाद साहसी गर्ल्स उनके लिए क्या मायने रखता है उसपर एक शब्द शेयर करने को कहा गया। यहां किशोरियों ने बताया –

·         खेल खेलना: कानाफूसी, क्रिकेट, सांप सीड़ी, खो-खो, फुटबॉल;

·         फिल्म: डोर, दंगल, चक दे ;

·         शरीर के बारे में, लड़कियों के अधिकार, मानवाधिकार, सहमति, माहवारी आदि,

·         मैं कुछ भी कर सकती हूं,

·         लड़कों के बराबर हम भी ताकतवर है

·         पहले हमें घर से बाहर निकलने को नहीं मिलता था, थोड़ा भी बाहर जाओ तो ताने सुनाए जाते थे लेकिन कार्यक्रम में हिस्सा लेने के चलते हम घर से बाहर निलकते है, अपनी सहेलियों से मिलते हैं और बहुत कुछ सीखते भी हैं।

·         स्कूल के बाद होने वाली ट्यूशन क्लास।




सत्र के अगले हिस्से में हमने उन कहानियों की बात की जिन्हें पढ़कर, देखकर हमें अच्छा लगा हो, खुशी की अनुभूति हुई हो, या प्रेरणा मिली है। जहां प्रशिक्षकों ने स्वदेश और दंगल फिल्म और सावित्री बाई फूले की बात की वहीं किशोरियों ने भी अपनी पंसदीदा कहानियों के बारे में साझा किया। एक प्रतिभागी ने एक कहानी के बारे में बताया जहां एक लड़की की जबरन शादी उसके परिवारवाले करवा रहे होते हैं पर वो आगे पढ़ाना चाहती है। वो सभी को चुनौती देते हुए आगे चलकर अपने सपने पूरे करती हैं। वहीं एक किशोरी ने शेयर किया कि एक लड़की एक लड़के को पसंद करती है, दोनो की शादी होने वाली होती है – लड़की को चेचक हो जाता है और उसके चेहरे पर अजीब से दाग बन जाते हैं। लड़का उससे शादी करने से इनकार कर देते हैं। लड़की भी नहीं चाहती कि वो लड़के से शादी करे तो वो आगे बढ़कर पढ़ाई करती है और अपना टीचर बनने का सपना पूरा करती है।




हमने साल के शुरुआत में अलग अलग स्कूलों और समुदायों में मानवाधिकार और मौलिक अधिकारों पर कार्यशालाओं का आयोजन किया था। यहां की सीख और कहानियों को ब्लॉग का रुप भी दिया। कार्यशाला के अलग हिस्से में हमने किशोरियों को ये ब्लॉग पढ़ने को कहा – गोले में बैठी हर लड़की ने इस कहानी का एक एक पैराग्राफ सबके सामने जोर से पढ़ा। इससे उन्हें दूसरे स्कूलों में हुई कार्यशालाओं और वहां से आई सीख का तो पता चला ही साथ ही एक पढ़ने का अभ्यास भी हुआ। बहुत कम लड़कियां थी जो साफ साफ बिना रोके टोक पढ़ पाई। हमारे लिए ये एक और पड़ाव रहा ये समझने का कि लड़कियों को किस और चीज की जरुरत है।

किशोरियां ये कहानियां पढ़ बेहद उत्साहित नजर आई। कहानियों की बात हुई और खुद कहानी न लिखी ऐसा तो संभव नहीं है। सभी प्रतिभागियों को समूह में बांटा गया और कहानी लिखने के लिए आमंत्रित किया गया।

पहली कहानी –

मैंने इस साल साहसी गर्ल्स कार्यक्रम से बहुत कुछ सीखा। अब तक मुझे लगता था कि जो ताकत लड़कों में होती है वो लड़कियों में कभी नहीं हो सकती। लेकिन जब हम साहसी गर्ल्स कार्यक्रम से जुड़े तो समझ में आया कि ये भ्रांति है और लड़कियां भी लड़कों जितनी ताकतवर होती है। मोना दीदी और पूर्वी दीदी ने हमारी हिम्मत जगाई और समझाया कि लड़कियां लड़कों से कम नहीं होती है। हम भी आगे बढ़ सकते हैं और अपने जीवन को अच्छे से जी सकते हैं। इन सभी बातों से हमें काफी अच्छा लगा और एक नया जोश आया कि हमें भी आगे बढ़ना है, कुछ करना है ताकि हम अपने परिवार का नाम रोशन कर सके।

हमेशा कहा जाता है कि लड़के और लड़कियों को समान अधिकार मिलने चाहिए लेकिन कई बार हमने देखा है कि ऐसा नहीं होता। बहुत सारी परिस्थितियों में लड़कियों की जगह लड़कों को अधिकार दिए जाते हैं। लड़कियों को शिक्षा का अधिकार मिलना चाहिए ताकि वो भी पढ़ाई कर जीवन में आगे बढ़ पाएं। इसके साथ ही अगर कोई गलत कदम उठाए तो उसे समझा पाए। एक बार की बात है कि जब हमारे स्कूल की छुट्टियां चल रही थी, भागवत की कथा का आयोजन किया जा रहा था। मैंने अपनी दादी से कहा कि इस बार मैं कलश रखने जाउंगी। दादी ने जवाब में कहा कि नहर बहुत दूर है, लड़कियां इतना दूर कलश भरने कैसे जा सकती है। अगर यही सवाल किसी लड़के ने किया होता तो उसे कभी ये नहीं बोला जाता और नाही उसे मना किया जाता। जीवन के अलग अलग क्षणों में इसी तरह से लड़कियों से अधिकार छीन लिए जाते है।




पिछले साल से साहसी गर्ल्स कार्यक्रम में हमने काफी कुछ सीखा – अपने शरीर को जाना, माहवारी के बारे में समझ बनाई, माहवारी होने के दौरान घर की महिलाएं अक्सर लड़कियों को वजन उठाने, आचार छूने, मंदिर जाने और नहाने से मना करती हैं जो सही बात नहीं है – लड़कियां इस दौरान या कभी भी अपवित्र नहीं होती। हमने अपने अधिकारों को समझा – हम भी लड़कों की तरह कहीं भी जा सकते हैं, पढ़ सकते हैं, खेल सकते हैं, सपने देख सकते हैं, पढ़लिख कर जॉब कर सकते हैं। हमारे माता पिता को हमारा सहयोग करना चाहिए, प्यार देना चाहिए, आगे बढ़ाना चाहिए। इसके अलावा ट्यूशन क्लास ने हमारी बहुत मदद की, मुझे अब पढ़ाई करने में बहुत मजा आता है।

प्रिय दीदी,

मैं आपके जैसे बनना चाहती हूं। मुझे नहीं पता कि मैं आपके जैसे बन पाउंगी या नहीं लेकिन मैं आगे पढ़ लिखकर आपके जैसा बनने की कोशिश जरुर करूंगी। मेरी माताजी भी यही कहती है कि पढ़ो लिखो और आगे बढ़ो। अगर कुछ नहीं बन पाएं तो पढ़ाई का कोई फायदा नहीं है। मुझे आप पर बहुत भरोसा है, आपकी बातें और सीख बहुत पसंद है। मेरे घर के लोग कई बार ताने मारते हैं कहते हैं कि तुम कुछ नहीं कर पाओगी, पढ़ नहीं पाओगी। इसलिए मैं चाहती हूं कि मैं इतना अच्छा पढूं और जीवन में आगे बढूं कि वो देख पाएं कि उनकी बात सही नहीं थी। मैं अपने माता पिता और आपका नाम रोशन करना चाहती हूं।

इसके अलावा एक प्रतिभागी ने चित्र के द्वारा अपनी बात को कागज पर उतारा – उसने एक लड़की को पानी का मटका ले जाते हुए दिखाया। इस चित्र से वो कहना चाहती है कि जब लड़की मटके में पानी भर कर लाए तो उसे भरने का काम लड़के को करना चाहिए। घर के कामकाज में लड़कों को महिलाओं और लड़कियों के साथ हाथ मिलाकर आधा आधा काम करना चाहिए क्योंकि इस जिम्मेदारी के बोझ के चलते लड़कियां अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाती और पीछे रह जाती है। लड़कों और लड़कियों को बराबर देखा और समझा जाना चाहिए।

इसी बीच ट्यूशन टीचर अनमोल भी पहुंचे जिन्हें देखकर छात्राएं बहुत खुश हुई। हमने उन्हें उनके योगदान के लिए सम्मानित किया। ये बेहद जरुरी है कि जो लोग काम करते हैं, अपना सहयोग देते हैं उन्हें ये महसूस कराया जाए कि वो कितने अहम हैं। ऐसा करने से न केवल काम बेहतर होता है बल्कि लोगों को आगे बढ़ने की और खुशहाली से रहने की प्रेरणा भी मिलती है। अनमोल के पढ़ाने से जो लड़कियों में एक जोश और उमंग भर आई है उसकी बात ही अलग है।  





कार्यक्रम के बाद साहसी गर्ल्स ने जमकर होली खेली। हम अलग अलग मुद्दों पर कई कार्यक्रम करते रहते हैं लेकिन त्यौहार की खुशी, एक दूसरे के साथ मिलकर होली खेलने की चमक ने दिन में चार चांद लगा दिए। हमारी और साहस की यही कोशिश है कि किशोरियां अपने जीवन में इस खुशी को महसूस कर पाएं और सपनों को पूरा करने की कोशिश में अपना 100 प्रतिशत दे ।