Monday, 17 July 2017

यौनिकता: अपने व्यक्तित्व को तलाशती स्वंय सहायता समूह की महिलाएं



बात तो आप सही कह रही हैं, इस बात पर मैं अपने साथ हुई एक घटना के बारे में बताना चाहती हूं। हमारे गांव में अक्सर मर्द अपनी पत्नियों को मारते हैं, एक बार मैंने एक महिला को बचाने की कोशिश की तो मेरे ही पति ने मुझे डांट दिया, कहा कि मुझे दूसरे के मामले में पड़ने की क्या जरुरत है? और बहुत बुरा-भला भी सुनाया,  फिर कई बार इन्हीं बातों पर आस-पड़ोस में लड़ाई भी हो जाती है। एक प्रतिभागी ने साप सीड़ी के खेल के दौरान छोटे समूह में बांटा।

पिछले हफ्ते जेंडर पर आधारित सत्र के दौरान कई अहम बातें सामने आई जिससे समझ में आया कि महिलाओं का अधिकतर समय घर में ही बीतता है, बाहर निकलने का मौका नहीं मिलता, अगर वो बाहर जाती भी हैं तो जब कोई बहुत जरुरी काम आ जाए वो भी पति की अनुमति लेकर। ऐसे में काम-काज, घर की देखभाल, पैसे की तंगी, चिंता परेशानी के बीच वो अपना दिल बहलाने या कुछ मनोरंजन करने के बारे में सोच भी नहीं पाती। इन्हीं बातों के मद्देनजर इस बार के सत्र यौनिकताको हमने खेल, चित्रकारी और नाटक के तौर पर तैयार किया था ताकि वो मनोरंजन के जरिए अपने आप को और अपने शरीर को समझ पाए।

सत्र की शुरुआत तलवार और ढाल के खेल से की गई जिसमें प्रतिभागियों ने जमकर धमा-चौकड़ी मचाई। ये खेल एक बहुत बेहतरीन तरीका है जिससे समूह की ताकत और रचनात्मक समाज को बनाने की सीख मिलती है। 



इसके बाद हमने पिछले सत्र की बातों को दोहराया और एक बार फिर सहमति पर बात की। रोचक बात ये थी कि महिलाएं एकदम स्कूल जाने वाले छात्राओं की तरह नज़र आ रही थी, कुछ-कुछ एक्टिविटी याद थी, कुछ याद करने की कोशिश कर रही थी, कई बातें जैसे कानाफूसी का खेल, जेंडर की कहानी एकदम याद थी उन्हें बताने के लिए उत्साह से हाथ खड़ा कर रही थी और ये सब करते हुए उनके चेहरे पर एक अलग ही रौनक थी।

पहली एक्टिविटी में हमने महिला प्रतिभागियों को साप-सीड़ी का खेल खेलने के लिए आमंत्रित किया, प्रतिभागियों को छह समूहों में बांटा गया और हर एक समूह को एक साप सीड़ी का खेल खेलने के लिए दिया। ये खेल बिलकुल वैसे ही खेलना था जैसे हम अपने बचपन में खेलते थे, पर इसमें छोटा सा बदलाव ये रहा-  सीड़ी चढ़ने और सांप काटने की जगह पर एक संदेश लिखा हुआ था, जिसे उस प्रतिभागी को पढ़ना था जिसकी गोटी वहां खेल के दौरान पहुंचती। 


ये खेल जितना मज़ेदार था, संदेश उतने ही संजीदा और अहम थे, ऐसे में ये एक्टिविटी काफी गहन हो गई। प्रतिभागी खेल खेलते हुए काफी खुश हो रहे थे, कभी जीतने की ललक दिखाई देती थी तो कभी सांप काटने पर दुख था पर इस खेल के जरिए हम महिलाओं के लिए एक सुरक्षित गोला बना पाए- कई संदेशों को सुनकर महिलाओं ने अपनी आपबीती अपने अपने समूह में बांटी- जहां मर्दों का शराब पीना, उसके बाद गाली-गलौच करना, पिटाई करना, विधवा होने की वजह से शुभ कार्यों का हिस्सा न बन पाना, समाज के ताने और उलाहना सुनना, कम उम्र में शादी होना, बेटे की चाह में चार से ज्यादा बच्चों की मां बनना जैसी कई बातें सामने निकलकर आई। कई महिलाएं काफी भावुक हो गई, ऐसे में उन्होंने अपने दर्द को बांटा, इसके साथ ही एक समूह की महिलाओं के बीच में पैसे के बंटवारे को लेकर विवाद भी हो गया। 


मुझे ये देखकर काफी खुशी हो रही थी क्योंकि जहां हम अपने मन की बात खुलकर रख सकते हैं वहीं हमें वो अपनापन और आत्मविश्वास महसूस होता है और यही बातें एक समूह को जोड़ने में अहम किरदार निभाती हैं। इसके बाद महिला प्रतिभागियों को चार समूहों में बांटा गया और चार अलग-अलग परिस्थितियां दी गई जिसपर उन्हें एक कहानी का निर्माण करके बड़े गोले में  एक नाटक प्रस्तुत करना था। महिलाएं पहले काफी झिझक रही थी, उन्हें लगा कि बस वो वहां जाकर परिस्थिति का समाधान सुना देंगी, नाटक तो वो कर ही नहीं सकती। लेकिन धीरे धीरे समूह में चर्चा करने के बाद किरदार बांटे गए और उन्होंने नाटक बना लिया।


दीदी ये नाटक नहीं ये तो सच्चाई है, हमारे यहां ऐसा बहुत होता है। हम तो नाटक कर लेंगे पर बताओ सरकार इसमें क्या करेगी- एक प्रतिभागी ने पूछा।
नाटक बनाओ तो सही, परेशानी का समाधान निकालने की सोचो तो शायद सरकार की जरुरत ही न पड़े।
और हुआ भी कुछ ऐसा ही, एक ग्रुप में एक महिला अपनी 14 साल की लड़की की शादी करने पर अटल थी लेकिन जब समूह की औरतों ने मिलजुल कर उसे कम उम्र पर लड़की की शादी करने के नुकसान बताए और उसे पढ़ाने के लिए प्रेरित किया तो वो मान गई। 

वहीं दूसरे नाटक में समूह ने मिलकर विधवा महिला की मदद की ताकि वो अपने बच्चों की पढ़ाई और खाने-पीने के लिए साधन जुटा पाए, तीसरे में समूह की औरतों ने मिलकर एक महिला की दुकान खोलने में मदद की और चौथे नाटक में शराब के नशे में धुत आदमी को उसकी बीबी को पिटने से रोक दिया। 


जो महिलाएं पहले झिझक रही थी, गुपचुप थी, केवल सरकार से मदद मांगने की सोच रही थी वो नाटक के बाद आत्मविश्वास और उम्मीद से ओत-प्रोत नजर आई। अब वो एक दूसरे से खुलकर बातचीत कर रही थी, हंस रही थी और उन्हें शायद समय की भी चिंता नहीं सता रही थी।

क्या आपको लगता है कि आप कमज़ोर हैं?’
पहली महिला: 'मैं तो कमज़ोर ही हूं न, जब पति हाथ उठाता है तो मैं क्या कर पाती हूं ?'

दूसरी महिला: 'नहीं मुझे नहीं लगता तू या फिर मैं कमज़ोर हैं, ये तो हमारी शर्म है और समाज का लिहाज है नहीं तो क्या हम अपने उपर हाथ उठाने वाले का हाथ नहीं पकड़ पाएंगे? हम तो मार भी सकते हैं, लेकिन वो पति है इसका लिहाज कर जाते हैं पर उन्हें किसी का लिहाज नहीं हैं। पर तू अपने दिल से इस बात को निकाल दे।'

मुझे अब कुछ कहने की जरुरत ही नहीं थी, मैं तो हमेशा की तरह मुस्कुरा रही थी क्योंकि पितृसत्ता की बुनियाद में अब सेंध लग चुकी है :-)

Tuesday, 11 July 2017

महिला सहायता समूह: जेंडर आधारित भेदभाव को चुनौती देती महिलाएं :-)



अगर कोई किसी लड़की को छेड़ रहा है तो दूसरी महिलाएं देखती क्यों रहे, अगर सारी महिलाएं एकजुट हो जाए तो किसी भी मुश्किल का सामना आसानी से कर सकती हैं। हम सड़क पर बैठ जाएंगे, तो हमारी मांगे माननी ही पड़ेगी। हमें अपनी सोच बदलनी होगी तभी कोई और चीज बदलेगी। 50 साल की महिला प्रतिभागी ने एक ग्रुप एक्टिविटी के दौरान इस बात को बुलंद आवाज़ में कहा। 

साहस बागपत के बिनौली में महिला स्वयं सहायता समूह से जुड़ी 52 महिलाओं के साथ जेंडर और महिला नेतृत्व को लेकर काम कर रहा है। 26 महिलाओं के समूह के साथ सुबह का सत्र और बाकी 26 महिलाओं के समूह के साथ दोपहर का सत्र चलाया गया। पहले समूह के मुकाबले ये समूह बहुत ऊर्जा, जोश, उम्मीद और सीखने की चाह से भरपूर नजर आया। 




सुबह के सत्र के बाद हम वर्कशॉप की जगह पर ही थोड़ा आराम कर रहे थे कि समय से 15 मिनट पहले ही दोपहर के सत्र में हिस्सा लेने वाली महिलाएं हॉल में पहुंची। इन महिला प्रतिभागियों की उम्र 23-55 साल के बीच थी, मैं थोड़ा ठिठकी क्योंकि कई महिलाएं 50 साल के पार थी। अक्सर जो मैं एनरजाइज़र करवाती हूं वो किशोर-किशोरियों और युवाओं में तो बेहद हिट रहा है लेकिन मैं असमंजस में थी कि क्या इतनी उम्रदराज महिलाएं इस खेल को खेलना भी चाहेंगी? पर उम्मीद के विपरित महिलाएं खुलकर खेलने लगी, यही नहीं कई प्रतिभागियों ने खुद खेल खेलाने के लिए हाथ उठाए, और फिर खेल खिलाया भी। पहली बार महसूस हुआ कि एनरजाइज़र ने सच में प्रतिभागियों में ऊर्जा भर दी। 



हमारी सभी वर्कशॉप बातचीत, कहानियों और फिल्मों पर आधारित होती हैं इसी वजह से कुछ अहम सहमतियों पर समझ बनाई गई। वर्कशॉप की शुरुआत कानाफूसी के खेल से हुई जहां दो लम्बी लाइनें एक कान से दूसरे कान तक पहुंचते पहुंचते दो शब्दों में सिमट गई, जिसके बाद प्रतिभागियों में हंसी की फुहार छूट गई। लेकिन हंसी के इस खेल से हमने जेंडर की कहानी बुनी – पुराने समय और आज के परिपेक्ष्य की तुलना करते हुए समझ बनाई कि कैसे कुछ परिस्थितियों ने एक ऐसा ढांचा बना दिया जिसकी वजह से महिला और पुरुष कुछ जिम्मेदारियों में बंधकर रह गए, उनकी विशेषताएं और कमी उनके लड़के और लड़की होने पर आधारित हो गई



इसके बाद प्रतिभागियों को दो अलग अलग समूहों में बांटा गया जहां उन्हें उनके महिला होने की वजह से मिले संदेशों को आपस में बांटने के लिए आमंत्रित किया गया।



नौकरी करने वाली महिलाओं को गलत समझा जाता है
लड़की बाहर किसी काम से नहीं जा सकती, उसे ताने मारे जाते हैं
बहुत कम लड़कियां स्कूल जा पाती हैं
समूह की बैठक में जानेवाली महिलाओं को भी गलत समझा जाता है
बेटी मां-बाप के घर पर नहीं रह सकती है
मुस्लिम महिला के पति की मौत पर उसे घर में ही रहना पड़ता है, वो किसी भी काम के लिए बाहर नहीं जा सकती, चाहे भूख से क्यों न मर जाए
स्कूल जाकर क्या करोगी, मैडम बनना है क्या
घर का कामकाज सीखो, ससुराल जाकर क्या करोगी
आदमी हर बात पर गाली गलौच करते हैं, हाथ उठाते हैं, खर्चे का हिसाब किताब मांगते हैं
कम उम्र में शादी करवा दी जाती है, फिर जल्दी बच्चे हो जाते हैं
10वीं का फार्म भरा था लेकिन मेरी शादी करा दी गई फिर मैं कुछ नहीं करवा पाई


इस दौरान कई प्रतिभागियों ने ये बोला कि आदमी से पहले तो औरतें ही औरतों की दुश्मन होती है, मुझे कुछ आश्चर्य नहीं हुआ, मैं जवाब देने वाली ही थी कि एक प्रतिभागी ने कहा कि वो ऐसा नहीं मानती- अगर औरतें एकजुट हो जाए तो हर समस्या का समाधान कर सकती है। अगर किसी औरत के साथ कुछ गलत हो रहा है तो उन्हें उसके खिलाफ आवाज़ उठानी चाहिए। 



मैं काफी खुश हुई क्योंकि यही तो समझ बनाने की कोशिश हम कर रहे हैं ऐसे में 50 साल की ये प्रतिभागी ने उन धारणाओं को कड़ी चोट पहुंचाई जिसके मुताबिक केवल युवा ही समाज में बदलाव ला सकते हैं, लेकिन आज मुझे विश्वास हो गया कि बदलाव लाने के लिए उम्र की ढाल बनाना सही नहीं है, किसी भी उम्र का शख्स बदलाव की चिंगारी शुरु कर सकता है बस वो मन में ठान ले।

अगली एक्टिविटी में प्रतिभागियों को एक बार फिर दो समूहों में बांटा जहां एक समूह को घर और दूसरे समूह को सार्वजनिक स्थान पर महिला और पुरुष के परिपेक्ष्य में जो फर्क दिखते हैं उसे आपस में बांटना था। एक और अहम बात ये थी कि इन फर्क को बताने में महिलाओं को झिझक नहीं हो रही थी, वो जानती है इस फर्क को, पर इस समूह की महिलाएं वो ढांचे को तोड़ने की इच्छा भी रखती है।



दीदी रात को क्या यहां तो मैं दिन में भी घर से नहीं निकलती क्योंकि लोग बातें बनाते हैं
मैं तो रात में भी घर से बाहर निकलने में नहीं डरती, पहले घबराहट होती थी पर अब आशा कार्यकर्ता बन गई हूं तो कभी भी कही भी जा सकती हूं
मनोरंजन के लिए कभी कभार सहेलियों के साथ मिलकर गीत गा लिए, यहां औरतों के मनोरंजन के लिए क्या होगा, आदमी तो चोपाल हो गई, सड़के हो गई और कुछ नहीं तो शराब के अड्डे पर ही मज़े कर लेते हैं
आदमी चौपाल पर दिखते हैं, लड़कियों तो गलियों में भी दिखाई नहीं देती
दोपहर का सत्र काफी मज़ेदार रहा, उम्मीदों और सपनों से भरे हुए इस सत्र की समाप्ति भी काफी प्रेरक रही :-)


मैं चाहती हूं कि मेरी बहू भी ऐसी बैठकों में आए, घर पर रहकर कामकाज तो होता ही रहेगा लेकिन वो बाहर निकलेगी, दूसरी महिलाओं के साथ उठेगी-बैठेगी, आपसे मिलेगी तो बहुत कुछ सीख पाएगी और अपने लिए कुछ करपाएगी, मेरा बेटा उसे नहीं आने देता क्या आप उसे समझा सकती हैं?”

वहीं सबसे सुखद यादगार जो मैं हमेशा याद रखूंगी वो ये कि हमें जो फ्रूटी और बिस्कुट दिए गए वो महिला स्वंय सहायता समूह से जुड़ी महिला की दुकान से खरीदे गए थे। सरकार की ये योजना काबिले-तारीफ़ है जो महिलाओं को आर्थिक रुप से सशक्त तो कर ही रही है, साथ ही उनके अंदर के उद्यमी को भी राह दिखा रही है वहीं साहस से जोड़कर उनकी मानसिकता बदलने का भी प्रयास कर रही है :-) बागपत का ये दिन एक नए बदलाव की रोशनी लेकर आया है, मैं खुश हूं कि मैं इस बदलाव की मुहिम का एक हिस्सा हूं :-) 

Monday, 10 July 2017

महिला सहायता समूह : मेरा जेंडर, मेरी पहचान :-)



घर में बैठने से क्या होगा, हम पूरा दिन कामकाज में लगा देते हैं, फिर भी कोई न कोई ताना मार ही देता है। जब घर से बाहर निकलेंगे तभी तो कुछ पता चलेगा या फिर नई जानकारी मिलेगी

मेरा पति इतना शराब का आदी है कि मुझे खाना नहीं बनाने देता, सब्जी में मसाले नहीं डालने देता, हर बात पर मारपीट पर उतर जाता है। इससे बड़ा फर्क और क्या होगा? ”

खुद तो पूरा पूरा दिन आदमी घर से बाहर घूमते रहते हैं, लेकिन अगर हम घर से पड़ोस में भी जाएं तो उन्हें बताना पड़ता है क्योंकि वो हम पर विश्वास नहीं करते? अगर हमने पूछ लिया तो फिर हमारी खैर नहीं

ये वो कहानियां है जो कभी कही किसी को सुनाई नहीं देती, शायद किसी के पास वक्त ही नहीं इन कहानियों को सुनने का या फिर ऐसा है कि ये किस्से हर स्तर पर तकरीबन हर औरत की जिंदगी का हिस्सा बन गए हैं कि एहसास ही नहीं हुआ कि हिंसा और रोजमर्रा की जिंदगी कैसे एक ही धागे में बंधकर रह गई। महिला सशक्तिकरण के लिए कई स्तर पर सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों की तरफ से कई उमदा प्रयास किए जा रहे हैं- मसलन आर्थिक रुप से उन्हें मजबूत करना, पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना, रोजगार के साधन उपलब्ध कराना, सरकारी स्कूलों में टॉयलेट का निर्माण आदि पर कहीं न कहीं इन प्रयासों में कुछ छूट जाता है। 



तकरीबन एक साल दिल्ली-एनसीआर में किशोर-किशोरियों, युवाओं और महिलाओं के साथ काम करने के बाद साहस को एक बहुत बड़ा मौका और जिम्मेदारी सौंपी गई है। बागपत जिला प्रशासन के सहयोग से साहस बिनौली में उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत महिला स्वंय सहायता समूह से जुड़ी 52 महिलाओं के साथ जेंडर और महिला नेतृत्व के मुद्दे पर एक समझ बनाने की मुहिम में जुट गया है। 


साहस ने अलग-अलग महिला सहायता समूह से जुड़ी 26 महिलाओं के साथ जेंडर पर आधारित पहली वर्कशॉप का आयोजन किया। शहरी और ग्रामीण परिपेक्ष्य में काफी अंतर होता है इसके साथ ही यहां साक्षरता का स्तर भी काफी कम है, इन्हीं कुछ बातों को ध्यान में रखते हुए बड़े ध्यान से वर्कशॉप की रुपरेखा तय की गई, हालांकि ये बात सच है कि जेंडर से जुड़े मुद्दे हर जगह कहीं न कहीं एक समान ही होते। महिला प्रतिभागी एकदम सही समय पर पहुंच चुकी थी और उनमें एक अलग तरह की उत्सुकता भी नजर आ रही थी। मैं यकीन से कह सकती हूं कि इस गांव में घर से निकलने वाली महिला काफी साहसी है और उनमें कुछ करने की चाह है क्योंकि रुढ़िवादी समाज की बेड़ियों की शिकन इनकी बातों में साफ झलकती है।

वर्कशॉप की शुरुआत हमने उंगली गेम से की, मुझे थोड़ी घबराहट थी क्योंकि यहां 25- 55 साल तक महिलाएं हिस्सा ले रही थी, वहीं ज्यादातर ये खेल मैंने किशोर-किशोरियां या फिर युवाओं को खिलाया है और ये वहां काफी हिट रहा है, पर यहां कैसे होगा मुझे नहीं पता था। अपेक्षाओं के विपरित महिलाओं ने पूरे जोशो-खरोश के साथ खेल में हिस्सा लिया, बहुत हंसी और अपने प्रयास के लिए तालियां भी बजाई। इसके बाद हमने अपना और साहस का परिचय दिया और उनके साथ काम करने का उद्देश्य भी सांझा किया। 



प्रतिभागियों के साथ मिलकर कानाफूसी का खेल खेलते हुए हमने जेंडर की कहानी बनाई और समझ बनाने की कोशिश की कैसे करोड़ों साल पहले की एक स्थिति अब सामाजिक ढांचा बन चुकी है जिसमें महिला और पुरुष दोनों पर भी एक अदृश्य सा दबाव बना हुआ है। जेंडर की समझ को आगे बढ़ाते हुए हमने प्रतिभागियों को दो अलग अलग ग्रुप में बांटा जहां हर एक प्रतिभागी को उनके महिला होने की वजह से मिले संदेश आपस में बांटने थे। इस दौरान प्रतिभागी असमंज में दिखे, एक महिला ने उठकर कहा कि वो अपने घर में किसी को बताकर नहीं आई इसलिए क्या वो यहां से जा सकती है। जेंडर के सत्र में एकदम लाइव उदाहरण मिल गया- जिसके बाद महिला प्रतिभागियों को साफ हुआ कि उन्हें क्या- क्या बांटना है, मसलन-





पति की अनुमति के बिना हम कहीं नहीं जा सकते, अगर पड़ोस में भी जाना है तो बताकर जाना होता है नहीं तो लोग बाते बनाते हैं, पति को बोलते और फिर वो हमपर शक करते हैं।

लड़कियों को पढ़ने नहीं भेजा जाता है, लड़के जा सकते हैं

बच्चे पैदा नहीं कर पाने की स्थिति में महिला को ससुरालवाले बहुत ताने मारते हैं, परेशान करते हैं।

तू लड़की है, पढ़ा-लिखाकर क्या करेंगे, पैसे क्यों बर्बाद करना आखिर ससुराल जाकर चूला-चौका ही तो करना है

पति के मर जाने पर औरत का जीवन नर्क बना दिया जाता है, समाज वाले उसे आराम से जीने नहीं देते

महिलाओं को घर का काम भी देखना पड़ता है और बाहर का भी, हर खर्च का हिसाब देना पड़ता है
अगर तुम्हें बाहर जाना है तो खाना बनाकर जाना पड़ेगा

मैं 8वीं में पढ़ती थी जब मेरी मां बीमार हो गई, उसके बाद मुझे बोला गया कि भाई-बहन पढ़ेंगे, फिर पढ़ने की बारी आई तो शादी हो गई, फिर पढ़ना चाहा तो बच्चा हो गया। अब बच्चे बढ़े हो गए हैं तो बच्चों के साथ ही कुछ पढ़ लेती हूं


महिलाओं को एक बार फिर दो ग्रुप में बांटा गया जहां एक तरफ उन्हें चर्चा करनी थी कि घर में महिला और पुरुष की स्थिति में क्या फर्क दिखाई देता है तो दूसरे ग्रुप को यही चर्चा सार्वजनिक स्थान को लेकर करनी थी।

सबसे अहम बात ये थी कि एक स्वर में सभी महिलाओं का कहना था कि उन्हें घर में रहना पड़ता है, बाहर जाने नहीं दिया जाता, घर का सारा काम उन्हें देखना पड़ता है, आदमी के पास कोई काम नहीं हो तो भी वो मदद नहीं करता, पूरा पैसा शराब में बहा देता है, ज्यादा खाना और दूध भी पुरुषों को ही दिया जाता है। 

गांव में एक लड़की घर से बाहर निकले तो चार लड़के उसके साथ बाहर निकलते हैं, छेड़खानी और बदतमीज़ी करते हैं

महिला प्रतिभागियों ने काफी बढ़चढ़ कर चर्चा में हिस्सा लिया, ये बहुत जरुरी था क्योंकि मुझे लगता है कि असमानता से हम तभी लड़ सकते हैं जब हमें लगता है कि असमानता है और ये हमारे साथ नहीं होनी चाहिए। इन महिलाओं में एक ललक है रुढ़िवादी परंपराओं को तोड़ने की और घर की चारदीवारी से निकलकर खुद के लिए कुछ करने की, ऐसे में जेंडर पर आधारित ये बातचीत काफी रोचक रही।


मीटिंग तो बहुत अच्छी रही, हमें बहुत मज़ा आया, मैं भी कुछ करना चाहती हूं। क्या आप अगली बार आओगे?’ एक प्रतिभागी ने पूछा
और मैं मुस्कुरा उठी