Saturday, 22 October 2016

“Peace in Patriarchy is war against WOMEN”


Remember the story of wicked Queen and her step daughter Snow White? Snow White was a lovely princess; her step mother was very cruel.
The Queen hated anyone who was more beautiful than her, she treated Snow White like a servant but she always obeyed and never complained.

The Queen had a magical mirror whom she used to ask, “Mirror, Mirror, on the wall, who is the fairest of all?” Every day the mirror had the same reply, “You are the fairest.” So the Queen remained content and happy every day with being the fairest. But as Snow White grew older, she grew more beautiful and that made the Queen jealous. One day the magic mirror told the Queen that someone else is fairest in the land and that is Snow White. In her jealous rage wicked Queen decided to kill Snow White. I heard this story when I was very young probably 7-8 years old, I loved that story but as I grew I thought this is merely a story nothing real about it. 


But as I sit down to write how I felt in the last 3 days, I feel that the WICKED QUEEN and her fake ego exist, though symbolically! The intention behind starting Sahas was to fill the large loopholes that I had witnessed, experienced and lived in the social space that claims to curb Gender based violence. Not even remotely I ever thought of giving competition or challenging the existent ecosystems who were trying to solve the predominant problem of gender based violence in their own unique way, in fact I felt inspired and motivated to begin Sahas as through this we wanted to hit the root cause of gender based violence. 


However this was nothing but the beautiful mirage created by pseudo social workers who taught Love, Empathy, Peace and Inclusion. So I would like to request all those intellectuals who claim to change the world by their intervention and are highly educated from the much acclaimed colleges to please go back to dictionary and read the meaning of the terms like peace, inclusion etc, because I doubt whether they even know the real existent meaning forget about understanding and applying in the real world. 

For the past 3 days we have been thinking almost day and night as to what harm are we doing to the existent kingdom? And trust me I have no answer! I am not able to understand that why a person “a man” here is not able to digest that 2 women without any support are able to leave their comfort zone and work towards a society that they desire to live in? Is that too much to ask for? Am I asking for a favor? Absolutely No! I am working and fighting every day to achieve those rights which are there for me. 


I worked in Media industry for almost 5 years; I loved and lived my work. But at the same time I experienced orthodox structures, hierarchy, patriarchy that tried every possible way to stop me but I never gave up. When I came to social space, I could smell honest emotions, feel the desire to work for a cause and importantly I believed that this space values people. 

Then the rude shock hit me like an avalanche as the space that helped me to trust backstabbed me, the space that helped set me free tried curbing my work by threatening the people I am working with, tried blocking the path I was taking ! I am not sad, scared or disheartened rather I am angry, very angry because they are the people who talk about equality, equity and peace but what do they do in reality! They keep grudges in their heart, creates conflict and loves being in conflict just like the wicked Queen.  

Unfortunately I feel, “Blind belief in Authority is the greatest enemy of truth” and when someone is not able to see and walk on the path of truth, their decline becomes closer. Also I want to say that competing with us will not help because we have better things to do and just like Arjun from Mahabharta, I aim for the eye of the fish, nothing more or else! 

From the very beginning of Sahas, I knew that the path won’t be easy but I never imagined that people would get so insecure that they would really try all the possible ways to block our work, without understanding that this work is the need of the hour and all of us in our own way is fighting the demon that is disfiguring the society. 


Albert Einstein rightly said “Great spirits have always encountered violent opposition from the mediocre minds. The mediocre mind is capable of understanding the people who refuses to bow blindly to conventional prejudices and chooses instead to express his opinions courageously and honestly”
So now, I know that like corporates even social space is a mesh of unsolicited structures; have strong power dynamics, patriarchal system and is scared of women taking charge of their space! This incidence has made me more aware, alert and also strengthens my will to work towards the vision that we have thought through Sahas, because,
                           “Peace in Patriarchy is war against WOMEN”  

Tuesday, 11 October 2016

महावारी और उससे जुड़ी बातें



अगर सैनेटरी पैड खरीदने के लिए पैसे नहीं होंगे तो मैं अपनी मां को सूती का कपड़ा पैड की तरह फोल्ड करके दूंगा ताकि वो पीरियड्स में इस्तेमाल कर लें। वो इसे अपने पर्स में भी रख सकती हैं ये बात एक 10 साल के प्रतिभागी ने वर्कशॉप के दौरान कही। 

हां ये बात सुनकर कोई भी हैरान होगा क्योंकि अक्सर सुनने में तो यही आता है कि महावारी तो लड़कियों की समस्या है और लड़कियों को समझाना चाहिए कि इस दौरान क्या-क्या एतिहात बरतनी चाहिए? पर हम भूल जाते हैं कि समाज में तो लड़के- लड़कियां दोनों रहते हैं ऐसे में महावारी के बारे में केवल लड़कियों को जागरुक करने का कोई मतलब नहीं है। इसी सोच के साथ हमने शाहबाद डेयरी के किशोर-किशोरियों के साथ महावारी पर आधारित वर्कशॉप की।


हाथ में सैनेटरी पैड थामे जब मोना ने ये पूछा,क्या आपने इस वस्तु को कभी देखा है?” तो उम्मीद के विपरित सभी प्रतिभागियों का उत्तर हां में था। लड़कियों के साथ साथ लड़कों को भी पता था कि ये सैनेटरी पैड है। जब पूछा गया कि इसका इस्तेमाल कब होता है? तो थोड़ी झिझक के साथ एक प्रतिभागी (जो अब तक नहीं बोल रही थी), उसने बहुत धीरे से बताया कि ये एमसी में इस्तेमाल किया जाता है। 





मेनस्ट्रूपीडियाकी फिल्म हैलो पीरियड्स के जरिए हमने पीरियड्स या महावारी क्या होती है? ये कब होती है? लड़कियों को महावारी क्यों होती है? सैनेटरी पैड्स का इस्तेमाल, महावारी के दौरान साफ-सफाई का महत्व को लेकर चर्चा की। वीडियो में हर बात को बड़ी गहराई और सरलता से समझाया गया है, हर बात हर प्रतिभागी को समझ में आ रही है इसे जानने के लिए हर टॉपिक के बाद रिवीज़न भी कराया गया। महावारी के दौरान होने वाले पेट दर्द, सिर दर्द और ऐठना को ठीक करने के लिए अलग-अलग योगासन बताए गए, प्रतिभागियों ने उन आसान को करके दिखाया जो बहुत मज़ेदार रहा। 


महावारी के दौरान क्या करना चाहिए?, क्या नहीं करना चाहिए?, महावारी से जुड़ी भावनाएं, उससे जुड़े तथ्य, मिथ्या बातों को जानने के लिए हमने माइंड मैपिंग की। लड़कियों को घर से बाहर नहीं निकलने दिया जाता, आचार को छूने नहीं दिया जाता’‘खटाई खाने को मना किया जाता है, कम मिर्च मसाले वाला खाना खाना चाहिए’, ‘मंदिर नहीं जाने दिया जाता, क्योंकि हम अपवित्र होते हैं। इन सभी विचार-विमर्श और उदाहरण को आधार बनाकर हमने बताया कि ये बातें सच नहीं है ये महज धारणाएं हैं, महावारी एक तरह का शारीरिक बदलाव है जो लड़कियों में किशोरावस्था के दौरान शुरू होता है और ये दर्शाता है कि वो स्वस्थ्य है। 



महावारी के बारे में खुलकर बात नहीं की जाती, और ये यौनांग से जुड़ा हुआ है, लड़कियों को भी इसके बारे में पूरी जानकारी नहीं होती इसलिए समाज में इसे एक धब्बे की तरह देखा जाता है। लड़कों और लड़कियों को एक साथ बैठकर इस बात पर चर्चा करने का एक अहम मकसद ये भी है कि महावारी को धब्बे की तरह न देखा जाए बल्कि उससे जुड़े दबे हुए सवालों और जिज्ञासा के उत्तर ढूंढे जा सके। मैं काफी उत्साहित और खुश थी, जिस सोच को लेकर हम आगे बढ़ रहे हैं वो हकीकत में तब्दील होते नज़र आ रही थी।

इस वर्कशॉप के दूसरे सत्र में हमने बॉडी इमेज और किशोरावस्था में पड़ने वाले प्रभाव के बारे में बातचीत की। सत्र की शुरुआत हुईआइना क्या कहता है?” से, जिसमें प्रतिभागी एक-एक करके शीशे के सामने अपने आप को देखेगे और उनके मन में सबसे पहला विचार क्या आता है, उसे एक पेपर पर लिखना था।



मैं सुंदर नहीं हूं, मैं स्वस्थ्य नहीं हूं, मेरे चेहरे पर अजीब से निशान है

मुझे अजीब लगा 

हां! गौर से खुद को शीशे में देखने से अंदर तक कुछ हिल जाता है, कहीं न कहीं अपने शरीर के प्रति सहजता नहीं होतीहै। इस एक्टिविटी के बाद प्रतिभागियों को ग्रुप में बांटा गया, उन्हें अलग-अलग विज्ञापन दिए गए और इन्हीं विज्ञापनों पर आधारित कुछ सवाल दिए गए जिसके जवाब उन्हें हां या नहीं में देने थे। इन सवालों के जरिए हमने बॉडी इमेज को लेकर समझ बनाने की कोशिश की- क्योंकि हम कैसे दिखते है, हमारा शरीर कैसा है, चेहरा कैसा है, मोटे हैं या पतले हैं, इसको लेकर हमारी एक समझ होना जरुरी है। 



नाटकों, विज्ञापनों और सिनेमा में दिखाए जाने वाले अभिनेता-अभिनेत्री शरीर की एक आइडियल छवि दर्शाते हैं- अक्सर लोग उनसे अपने शरीर की तुलना करते हैं और वही शरीर पाने की होड़ में जुट जाते हैं। ये होड़ किशोरावस्था में देखने को मिलती है जो शरीर के लिए बेहद नुकसानदेयक हो सकती है साथ ही हीन भावना को भी जन्म देती है। 

माइंड मैपिंग के जरिए एक पुरुष का शरीर कैसा होना चाहिए और एक महिला का शरीर कैसा होना चाहिए के बारे में विचार विमर्श किया। इसी चर्चा को आधार बनाकर मोना ने समझाया कि कैसे समाज एक आदमी और महिला से उम्मीद करता है कि वो शारीरिक तौर पर कैसे दिखने चाहिए? जो लोग इस ढांचे में नहीं आते तो उनपर ऐसा बनने का दबाव बनाया जाता है, ताने और उलहाने दिए जाते हैं। आइडियल शरीर को पाने की होड़, दवाब को ही बॉडी इमेज बोला जाता है। प्रतिभागियों ने खुलकर अपने मन की बातें सामने रखी जिसे सुनकर उनके अंदर चलने वाले विचारों का पता चला। 



तीसरी वर्कशॉप के अंत तक दिख रहा था कि प्रतिभागी खुल रहे हैं, अभी भी शर्म और झिझक है पर जिस तरह से वो अपनी कहानियां बांट रहे थे मुझे यकीन हो गया था कि वो दिन ज्यादा दूर नहीं है जब वो खुलकर अपने मन की बात गोले में बिना झिझक के बांट पाएंगे। 

मेरा बदलता शरीर



क्या आप अपने शरीर को जानते है, पहचानते और समझते हैं? आप सोच रहे होंगे ये कैसा सवाल है और इस सवाल को पूछने का क्या तुक बनता है? तो थोड़ा अपने दिमाग पर जोर डालकर सोचे कि क्या आप शरीर के सभी अंगों को ठीक से जानते हैं और हां क्या आपने सभी अंगों को देखा हैं और आप इस बारे में बातचीत करने में कितने सहज है? खैर! जब भी मैं शरीर और शारीरिक बनावट के बारे में सोचती हूं तो मेरे ध्यान में सबसे पहले किशोरावस्था आती है। ऐसा इसलिए क्योंकि जीवन का ये दौर बदलाव से ओत-प्रोत होता है  चाहे वो शारीरिक हो, मानसिक हो या समाजिक। किशोरावस्था में होने वाले शारीरिक बदलाव बेहद अहम होते हैं साथ ही वो उलझन में डाल सकते हैं, परेशान कर सकते हैं और बहुत सारे सवाल खड़े कर देते हैं। ऐसे ही सवालों के जवाब ढूंढने और उनसे जुड़ी कहानियों को समझने के लिए हमने अपनी दूसरी वर्कशॉप मेरा बदलता शरीर का आयोजन किया।



 
मेरे दिमाग में कई तरह की बातें चल रही थी, ये मुद्दा जितना जरुरी है उसे उतने ही संवेदनशील तरीके से बताना भी अहम है। साहस के जरिए हम लगातार कोशिश कर रहे हैं लड़के और लड़कियां एक साथ बैठकर इस मुद्दे पर न केवल अपनी समझ बनाएं बल्कि उसपर सहज तरीके से बातचीत भी कर पाएं। 
वर्कशॉप की शुरुआत में प्रतिभागियों को ग्रुप में बांटते हुए उनके सामने 3 सवाल रखे मसलन उन्हें पहली बार कब पता चला कि वो लड़का हैं या लड़की हैं? ये बात सुनकर उन्हें कैसा लगा और किसने उन्हें ये बताया? आसान से इस सवाल ने प्रतिभागियों को काफी सोच विचार में डाल दिया- पहले तो कई प्रतिभागियों ने कहा किइसमें बताने की क्या जरुरत है, हमें तो पता है कि हम लड़के हैं या फिर लड़की हैं...और 5-6 साल की उम्र में तो सभी को पता चल ही जाता है।पर जब ग्रुप में चर्चा आगे बढ़ी तो कई कहानियां सामने निकल कर आई।



जब मुझे पहली बार पता चला कि मैं लड़की हूं तो मुझे अजीब लगा। अब तो मैं शरारती और बदमाश नहीं बन पाउंगी जैसे लड़के कर सकते हैं।

मुझे 5 साल की उम्र में पता चला कि मैं लड़का हूं पर मुझे अच्छा नहीं लगा। सोचा कि अगर मैं लड़की होती तो कितना अच्छा होता।

जब मुझे पता चला कि मैं लड़का हूं तो मुझे लगा कि मैं कुछ भी कर सकता हूं।

मैं सोच में पड़ गई थी कि महज लड़का होना या लड़की होना जीवन के मायने कितने बदल देता है, हम सहमति और चॉव्इस (किसी चीज का चुनाव करने की आज़ादी) के बारे में कितनी बातें करते हैं पर अगर एक 12 साल की लड़की को ये लगता है कि वो शरारत इसलिए नहीं कर सकती क्योंकि वो लड़की है तो बाकी बातें तो महज किताबी हो जाती हैं। 

इसके बाद प्रतिभागियों को शरीर का वो अंग चुनने के लिए कहा गया जो उन्हें बेहद पसंद है और क्यों, साथ ही उन्हें उस अंग के बारे में लिखने को कहा गया जो उन्हें नापसंद है। उम्मीद के मुताबिक लगभग सभी प्रतिभागियों ने बाल, चेहरे, आंखों को पसंदीदा अंग के तौर पर देखा और नापसंद में भी वो विचार रहे। 


अब प्रतिभागियों को दो ग्रुप- एक लड़कों और एक लड़कियों का में बांटा और उन्हें बॉडी मैप बनाने को कहा गया- जिसमें शरीर के हर अंग को दर्शाना है, साथ ही शरीर में हो रहे बदलावों के बारे में चर्चा करनी थी। मैं लड़कों के ग्रुप के साथ थी- मैंने पहली बार ये देखा कि कई लड़के अपना बॉडी मैप बनवाने के लिए उत्सुक थे। बहुत जल्दी ही उन्होंने एक लड़के का चुनाव कर लिया और उतनी ही फुर्ती से उसका मानचित्र भी बना लिया, शरीर के अंग भी बना लिए, पर फिर वो एकदम रुक गए। काफी पूछताछ के बाद उन्होंने मुझे वहां से हटने को कहा ताकि वो बॉडी मैप को पूरा करें। ये झिझक सामान्य थी क्योंकि अपने शरीर के बारे में बात करना, फिर उन्हें पेपर पर उतारना वो भी किसी लड़की के सामने ये उनके साथ पहली बार हो रहा था। वहीं लड़कियां भी पूरी शिद्दत के साथ बॉडी मैप बना चुकी थी। दोनों ग्रुप ने बड़े सहजता और विश्वास के साथ अपने बॉडी मैप को समझाया और जवाबों को बड़े गोले में बांटा।


शरीर में होने वाले बदलाव की कई बुरी बातें है- हम अपने पिता और भाई के साथ एक बिस्तर पर सो नहीं सकते। महावारी में पेट और शरीर में काफी दर्द होता है। घर से बाहर जाने पर बहुत रोक-टोक होती है। और चुन्नी भी लेनी पड़ती है। हर काम में इजाजत लेनी पड़ती है। इस बात ने मुझे अंदर से झकझोर दिया, एक 11 साल की लड़की अपने आप को एक कैदी की तरह महसूस कर रही है क्योंकि वो बड़ी हो रही है, उसके शरीर में होने वाले बदलाव उसके पांव की बेड़ियां बनकर रह गए हैं। वहीं लड़कों ने भी शरीर में होने वाले बदलावों से आने वाली समस्याओं के बारे में बताया, इस समय शरीर से शुक्राणु बाहर निकलते हैं, जिससे हमें काफी कमज़ोरी महसूस होती है




एक फिल्म और पावरपाइंट प्रेजेंटेसन के जरिए हमने किशोरावस्था में होने वाले शारीरिक बदलाव, उनकी महत्वता, लड़के और लड़कियों के यौनांग के बारे में चर्चा की। ये सत्र काफी गहरा हो चुका था, एकदम सन्नाटा पसर गया था, लड़कियां अपना मुंह छिपाने लगी तो लड़के इधर-उधर देखने लगे। ये हैरान और परेशान करने वाली बात ही है कि जो अंग हमारे शरीर के लिए इतने अहम है, जिसके जरिए सृष्टि आगे बढ़ती है, जो नए जीवन का स्रोत हैं उन्हें अपने सामने देखकर इतनी शर्म और झिझक होती है। समाजिक ढांचे ने अंगों को भी सही और गलत की परिभाषा में बांध दिया है। इसी बात को और गहराई और खुलेपन से समझने के लिए प्रतिभागियों को 4 अलग-अलग ग्रुप में बांटा गया और एक कहानी पर चर्चा करने को कहा गया। किशोरावस्था में होने वाले शारीरिक बदलाव, समाज का इन बदलावों पर नजरिया, और इस नजरिए का किशोर-किशोरियों के व्यवहार पर आधारित थी ये कहानियां। एक बार फिर प्रतिभागियों के जवाबों, सीखने की चाह और समझ ने मुझे उत्साहित किया। 

अगर मैं रॉबिन की जगह होता तो कभी वो मैजिक दवाई का इस्तेमाल नहीं करता बल्कि सुबह उठकर घूमने जाता, कसरत करता और सही खाना खाता ताकि मेरा शारीरिक विकास सही तरीके से हो।


नहीं दीदी, मुझे नहीं लगता कि गोरा रंग सुंदरता की पहचान है। उसकी दोस्त को उसके साथ ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए था, साथ ही हमारा आत्मविश्वास एकदम शालिनी के जैसा होना चाहिए।


मैं काफी संतुष्ट थी, आज हमने इन किशोर-किशोरियों के साथ बहुत ही अहम पड़ाव को पार किया है- इस उम्र में होने वाले शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक बदलाव के बारे में बातचीत की शुरुआत हुई। इन मुद्दों पर न तो स्कूल में और नाही परिवार में बातचीत होती है जिसकी वजह से कई सवाल, कई तरह की जिज्ञासा अधूरी-अनसुलझी रह जाती है जो किशोर-किशोरियों में भटकाव या दिशाहीनता का भी कारण बन सकती हैं।